शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहा बरहमोरीया विद्यालय, बच्चों की शिक्षा पर संकट
विष्णुगढ़ : प्रखंड अंतर्गत कुसुभा पंचायत में स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय बरहमोरीया की स्थिति सरकारी शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत को उजागर करती है। एक ओर जहां सरकार द्वारा विद्यालय भवन को आकर्षक और सुविधायुक्त बनाया गया है, वहीं दूसरी ओर शिक्षकों की भारी कमी के कारण यहां पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं का भविष्य अधर में लटका हुआ है।
विद्यालय देखने में काफी सुंदर है। यहां साफ-सफाई की समुचित व्यवस्था है, पंखों की सुविधा भी उपलब्ध है और बच्चों को समय पर मध्यान्ह भोजन (मिड-डे मील) भी दिया जाता है। लेकिन इन सभी सुविधाओं के बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
विद्यालय में कक्षा 1 से लेकर कक्षा 8 तक की पढ़ाई होती है, लेकिन पूरे विद्यालय में मात्र तीन शिक्षक—दो पुरुष और एक महिला—ही कार्यरत हैं। ऐसे में यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि एक ही समय में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना कितना कठिन कार्य है।
शिक्षकों की कमी के कारण बच्चों को न तो विषयवार पढ़ाई मिल पा रही है और न ही उन्हें व्यक्तिगत रूप से मार्गदर्शन मिल रहा है। इससे उनकी बुनियादी शिक्षा भी कमजोर हो रही है, जिसका असर उनके भविष्य पर पड़ना तय है
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी के कारण वे मजबूरी में अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेजने को विवश हैं। निजी स्कूलों में अत्यधिक फीस, किताबों और अन्य खर्चों का बोझ गरीब परिवारों के लिए परेशानी का कारण बन रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार की उदासीनता के चलते निजी विद्यालयों का मुनाफा बढ़ रहा है, जबकि गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार आर्थिक रूप से टूट रहे हैं।
ग्रामीणों और अभिभावकों में इस स्थिति को लेकर गहरा आक्रोश है। उनका कहना है कि यदि सरकारी विद्यालयों में पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की नियुक्ति कर दी जाए, तो बच्चों को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सकती है और उनका भविष्य सुरक्षित हो सकता है
ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि:
विद्यालय में शीघ्र अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्ति की जाए
प्रत्येक कक्षा के लिए अलग शिक्षक सुनिश्चित किया जाए
शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए ठोस कदम उठाए जाएं
बरहमोरीया विद्यालय की स्थिति सिर्फ एक विद्यालय की कहानी नहीं है, बल्कि यह झारखंड के अधिकांश सरकारी विद्यालयों की वास्तविकता को दर्शाती है। यदि समय रहते शिक्षकों की कमी को दूर नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ी की शिक्षा और भविष्य दोनों खतरे में पड़ सकते हैं।
रिपोर्टर : संदीप मिश्रा


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