अमिताभ बच्चन से हार तक: हेमवती नंदन बहुगुणा की राजनीतिक यात्रा
राजनीति का पहला और अंतिम लक्ष्य सत्ता होता है। न पाप, न पुण्य, न धर्म, न अधर्म — सब कुछ नीति है, और यही राजनीति है। उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास गोविंद बल्लभ पंत से शुरू होकर चौधरी चरण सिंह तक फैला हुआ है, जहां सिद्दांतों से हटकर सत्ता की सिद्धि सबसे बड़ा मकसद बन गया था। इसने उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसा दौर शुरू किया, जिसने दशकों तक इस प्रदेश को चैन की सांस नहीं लेने दी।
1969 के विधानसभा चुनाव के करीब आते-आते यूपी की सियासत की ज्यामिति पूरी तरह बदल चुकी थी। सरकारें बनती और गिरती रहीं, लेकिन किसी को स्थायी तौर पर सत्ता हासिल नहीं हो पाई। इसी बीच 1973 में हेमवती नंदन बहुगुणा यूपी के मुख्यमंत्री बने। वे राजनीति के ऐसे किरदार थे जिनकी हर सांस राजनीति से जुड़ी थी। 24 घंटे वह राजनीति के लिए समर्पित रहते थे। उनका राजनीति से रिश्ता ‘दिया और बाती’ जैसा था, जिसमें दोनों का साथ और महत्व बराबर था। जब राजनीति ने उनका साथ छोड़ा तो उन्होंने भी राजनीति को छोड़ दिया।
हेमवती नंदन बहुगुणा का जन्म 25 अप्रैल 1919 को उत्तराखंड के पौड़ी जिले के बुधाणी गांव में हुआ था। वे भारत के उन नेताओं में से थे जिनसे हार की कल्पना भी मुश्किल थी। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश सरकार उनके खिलाफ इतनी सख्त हो गई थी कि उन्होंने हेमवती के पकड़ने पर पांच हजार रुपये का इनाम तक घोषित कर दिया था। लेकिन उनके तेवर कभी कमजोर नहीं पड़े।
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान हेमवती छात्र राजनीति में सक्रिय हो गए और कांग्रेस पार्टी से जुड़े। लाल बहादुर शास्त्री के सम्पर्क में आने के बाद उन्होंने कांग्रेस का स्थायी सदस्य बनना तय किया। 1936 से 1942 तक वे छात्र आंदोलनों का हिस्सा रहे और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई।
आजादी के बाद वे यूपी कांग्रेस कमेटी के लगातार सदस्य रहे और 1957 में पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी पद पर पहुंचे। श्रम और उद्योग विभाग के उपमंत्री के रूप में भी उन्होंने काम किया। 1963 से 1969 तक यूपी कांग्रेस महासचिव रहे और 1967 में अखिल भारतीय कांग्रेस का महामंत्री चुने गए।
1969 में कांग्रेस में टूट की स्थिति आई। चरण सिंह कांग्रेस छोड़ चुके थे, और त्रिभुवन नारायण सिंह, कमलापति त्रिपाठी और हेमवती नंदन बहुगुणा अलग-अलग गुटों में बंट गए। उस समय त्रिभुवन नारायण सिंह यूपी के मुख्यमंत्री थे लेकिन उपचुनाव हार गए। इसके बाद कमलापति त्रिपाठी मुख्यमंत्री बने, पर भ्रष्टाचार और विद्रोह के आरोपों के चलते उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
इस मौके पर इंदिरा गांधी ने नया चेहरा तलाशा और हेमवती नंदन बहुगुणा को 8 नवंबर 1973 को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। उनका कार्यकाल 1975 तक रहा। उन्होंने इस दौरान प्रदेश की राजनीति में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए।
हालांकि 1980 के दशक में उनका राजनीतिक सफर संघर्षमय हो गया। 1984 के लोकसभा चुनाव में वे लोकदल की टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे, जहां उनका सामना बॉलीवुड सुपरस्टार अमिताभ बच्चन से हुआ। किसी ने सोचा भी नहीं था कि बहुगुणा अमिताभ से हार जाएंगे, लेकिन 1 लाख 87 हजार वोटों से उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
इस हार के बाद हेमवती नंदन बहुगुणा ने राजनीति से दूरी बनानी शुरू कर दी। 17 मार्च 1989 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी राजनीतिक विरासत उनके बच्चों के रूप में आज भी जीवित है। उनके बेटे विजय बहुगुणा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, जबकि उनकी बेटी रीता बहुगुणा जोशी सांसद रही हैं और वर्तमान में भाजपा से जुड़ी हैं।
हेमवती नंदन बहुगुणा की कहानी राजनीति की कड़वी सच्चाईयों और सिद्धांतों के संघर्ष की मिसाल है — एक ऐसा सफर जो सत्ता की राजनीति में संघर्ष और समर्पण का प्रतीक बन गया।

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