आंखों से नहीं देख सकते, फिर भी फतह की 20 हजार फीट ऊंची हिमालयी चोटी

कहानी अगर जज्बे की हो तो मुश्किलें भी छोटी पड़ जाती हैं। झारखंड के दो दृष्टिबाधित युवाओं ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। टोडानहातू गांव के रहने वाले शेखर गोप और धीरज कुम्हार ने लद्दाख की ऊंची पहाड़ियों में पर्वतारोहण अभियान का हिस्सा बनकर साबित किया कि शारीरिक चुनौती किसी बड़े लक्ष्य के रास्ते की आखिरी दीवार नहीं होती।

दोनों युवाओं ने 25 से 31 अगस्त के बीच मारखा घाटी में स्थित 20,472 फीट ऊंची झो जोंगो चोटी के अभियान में हिस्सा लिया। इस दौरान शेखर गोप चोटी तक पहुंचने में कामयाब रहे। वहीं, धीरज कुम्हार की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें 16,732 फीट की ऊंचाई पर बने बेस कैंप से आगे नहीं बढ़ने का फैसला लेना पड़ा।

साधनों की कमी से शुरू हुआ सफर

शेखर और धीरज के लिए यह उपलब्धि अचानक नहीं आई। दोनों जन्म से दृष्टिबाधित हैं और शुरुआती जीवन में उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए जरूरी सुविधाएं भी आसानी से उपलब्ध नहीं थीं। रोजमर्रा के कई कामों के लिए उन्हें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था।

उनकी जिंदगी में बदलाव तब शुरू हुआ, जब वर्ष 2022 में वे टाटा स्टील फाउंडेशन की दिव्यांग समावेशन पहल ‘सबल’ से जुड़े। यहां उन्हें ब्रेल पढ़ने, स्वतंत्र रूप से आवाजाही करने और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल करने जैसी जरूरी ट्रेनिंग मिली। धीरे-धीरे दोनों ने अपने फैसले खुद लेने और बिना सहायता के कई काम करने का आत्मविश्वास हासिल किया।

फुटबॉल से पर्वतारोहण तक

पर्वतारोहण के साथ-साथ दोनों खेलों में भी अपनी पहचान बना चुके हैं। शेखर गोप झारखंड की दृष्टिबाधित फुटबॉल टीम की कप्तानी कर चुके हैं, जबकि धीरज कुम्हार राष्ट्रीय स्तर पर राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

तुमुंग में आयोजित अनुभव आधारित प्रशिक्षण ने भी दोनों के व्यक्तित्व को निखारने में अहम भूमिका निभाई। कठिन परिस्थितियों में टीम के साथ काम करना, चुनौतियों का सामना करना और नेतृत्व क्षमता विकसित करना उनके प्रशिक्षण का हिस्सा रहा। यही अनुभव आगे चलकर उनके पर्वतारोहण अभियान में भी काम आया।

बर्फीली ऊंचाइयों के लिए महीनों की तैयारी

झो जोंगो अभियान आसान नहीं था। इसके लिए दोनों ने दलमा की पहाड़ियों में विशेष प्रशिक्षण लिया। अभ्यास के दौरान उनकी फिटनेस, सहनशक्ति और मानसिक मजबूती पर काम किया गया, ताकि लद्दाख की कठिन परिस्थितियों का सामना किया जा सके।

लद्दाख पहुंचने के बाद असली चुनौती सामने थी। करीब 20 हजार फीट की ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी, बेहद कम तापमान और कठिन पहाड़ी रास्तों ने अभियान को चुनौतीपूर्ण बना दिया। इसके बावजूद दोनों लगातार आगे बढ़ते रहे।

एक ने चोटी छुई, दूसरे ने हिम्मत नहीं हारी

अभियान के दौरान धीरज की तबीयत खराब हो गई। सुरक्षा और स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें 16,732 फीट की ऊंचाई पर स्थित बेस कैंप में रुकना पड़ा। हालांकि, उन्होंने अभियान में अपनी भूमिका और प्रयास को पूरा किया।दूसरी ओर शेखर ने अपनी चढ़ाई जारी रखी और आखिरकार 20,472 फीट की ऊंचाई पर स्थित झो जोंगो चोटी तक पहुंचने में सफलता हासिल की।

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