जन्म हुआ उस “जादूगर” का, जिसने हॉकी को बना दिया जुनून
जब ध्यानचंद मैदान पर उतरते थे, तो दर्शकों की नजरें उनकी स्टिक और गेंद के बीच होने वाले अद्भुत तालमेल पर टिक जाती थीं। गेंद उनकी स्टिक से इस तरह चिपकी रहती थी, मानो दोनों के बीच कोई अनदेखा रिश्ता हो। उनकी ड्रिब्लिंग, गति और गोल करने की कला ने उन्हें विश्व हॉकी का एक अमर सितारा बना दिया।
ध्यानचंद भारतीय हॉकी टीम की उस स्वर्णिम पीढ़ी का हिस्सा थे, जिसने दुनिया के खेल मैदानों पर भारत का तिरंगा गर्व से लहराया। उन्होंने 1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और तीनों ही बार भारतीय टीम ने स्वर्ण पदक जीता।
स्टिक में था सचमुच जादू?
लेकिन असली “जादू” उनकी स्टिक में नहीं, बल्कि उनकी मेहनत, अनुशासन और खेल के प्रति समर्पण में था।
भारत सरकार ने वर्ष 1956 में मेजर ध्यानचंद को पद्म भूषण से सम्मानित किया। उनके जन्मदिन, 29 अगस्त, को भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
उनकी हॉकी स्टिक भले ही अब मैदान में नहीं चलती, लेकिन उसका जादू आज भी भारतीय खेल प्रेमियों के दिलों में जिंदा है।
मेजर ध्यानचंद—एक नाम, एक युग और भारतीय हॉकी का अमर जादू।
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