Holi Poems in Hindi: ‘जब फागुन रंग झमकते हों…’ रस और राग से भरी मनमोहक होली की कविताएं

मार्च आते ही, यानी फागुन का महीना दस्तक देते ही, प्रकृति मानो रंगों की चादर ओढ़ लेती है। चारों ओर होली का उल्लास फैल जाता है और वातावरण में खुशी, उमंग और प्रेम की खुशबू घुल जाती है। खासकर छात्रों के बीच इस त्योहार को लेकर अलग ही जोश और उत्साह देखने को मिलता है, क्योंकि होली केवल रंगों का पर्व नहीं है, बल्कि आपसी मेल-जोल, अपनत्व और मनमुटाव मिटाने का भी अवसर है।

होली आई है / फणीश्वर नाथ रेणु

हिंदी साहित्य में होली पर रची गई कविताएं इस पर्व की भावना को और भी गहराई से व्यक्त करती हैं। “जब फागुन रंग झमकते हों…” जैसी पंक्तियां रस, राग और भावनाओं का ऐसा सुंदर संसार रचती हैं, जो मन को रंगों से भर देती हैं। इसी भावना को साझा करते हुए, होली के इस शुभ अवसर पर यहां प्रसिद्ध कवियों और लेखकों की लिखी हुई 5 चुनिंदा कविताएं प्रस्तुत की जा रही हैं, जो इस पर्व की खुशी और रंगीनी को शब्दों में पिरोती हैं।

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की / नजीर अकबराबादी

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।

और दफ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।

परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।

खूम शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।

महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।

हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे

कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज-ओ-अदा के ढंग भरे

दिल फूले देख बहारों को, और कानों में अहंग भरे

कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे

कुछ घुंगरू ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की।

गुलजार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।

कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।

मुंह लाल, गुलाबी आंखें हो और हाथों में पिचकारी हो।

उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।

सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।

फूलों ने होली / केदारनाथ अग्रवाल

मार दी तुझे पिचकारी / सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

मार दी तुझे पिचकारी, कौन री, रंगी छबि यारी?

फूल -सी देह,-द्युति सारी, हल्की तूल-सी संवारी,

रेणुओं-मली सुकुमारी, कौन री, रंगी छबि वारी?

मुसका दी, आभा ला दी, उर-उर में गूंज उठा दी,

फिर रही लाज की मारी, मौन री रंगी छबि प्यारी।

विश्व मनाएगा कल होली / हरिवंशराय बच्चन

होली आई है / फणीश्वर नाथ रेणु

सुख से हंसना, जी भर गाना

मस्ती से मन को बहलाना

पर्व हो गया आज-साजन! होली आई है!

हंसाने हमको आई है! साजन! होली आई है!

इसी बहाने क्षण भर गा लें, दुखमय जीवन को बहला लें

होली आई है! जलाने जग को आई है!

मार दी तुझे पिचकारी / सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

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