पहचान
राजा ने हुक्म दिया कि उसके राज में सब लोग अपनी आँखें बंद रखेंगे ताकि उन्हें शांति मिलती रहे। लोगों ने ऐसा ही किया क्योंकि राजा की आज्ञा मानना जनता के लिए अनिवार्य है। जनता आँखें बंद किए-किए सारा काम करती थी और आश्चर्य की बात यह कि काम पहले की तुलना में बहुत अधिक और अच्छा हो रहा था। फिर हुक्म निकला कि लोग अपने-अपने कानों में पिघला हुआ सीसा डलवा लें क्योंकि सुनना जीवित रहने के लिए बिलकुल ज़रूरी नहीं है। लोगों ने ऐसा ही किया और उत्पादन आश्चर्यजनक तरीक़े से बढ़ गया।
फिर हुक्म ये निकला कि लोग अपने-अपने होंठ सिलवा लें, क्योंकि बोलना उत्पादन में सदा से बाधक रहा है। लोगों ने काफ़ी सस्ती दरों पर होंठ सिलवा लिए और फिर उन्हें पता लगा कि अब वे खा भी नहीं सकते हैं। लेकिन खाना भी काम करने के लिए बहुत आवश्यक नहीं माना गया। फिर उन्हें कई तरह की चीज़ें कटवाने और जुड़वाने के हुक्म मिलते रहे और वे वैसा ही करवाते रहे। राजा रातदिन प्रगति करता रहा। फिर एक दिन ख़ैराती, रामू और छिदू ने सोचा कि लाओ आँखें खोलकर तो देखें। अब तक अपना राज स्वर्ग हो गया होगा। उन तीनों ने आँखें खोलीं तो उन सबको अपने सामने राजा दिखाई दिया। वे एक दूसरे को न देख सके।
इस कहानी “पहचान” का नैतिक संदेश है:
बिना सोचे-समझे किसी भी आदेश का पालन करना और अपनी सोचने-समझने की शक्ति खो देना व्यक्ति और समाज दोनों के लिए हानिकारक है। हमें अपनी आँखें, कान और विवेक हमेशा खुले रखने चाहिए।
कहानी यह भी बताती है कि अंधी आज्ञाकारिता से स्वतंत्रता, पहचान और मानवीय अधिकार समाप्त हो सकते हैं। जो लोग सवाल नहीं करते, वे धीरे-धीरे अपनी वास्तविक स्थिति को पहचानना भूल जाते हैं। इसलिए हर व्यक्ति को तर्क, जागरूकता और आत्मसम्मान के साथ निर्णय लेना चाहिए।
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