उमर अधिक हो गई, नौकरी कहीं नहीं मिल पाई

आज पूरे यूपी भर में पुलिस भर्ती का पर्चा लीक होने की चर्चा है और हर तरफ छात्रों का हंगामा होने साथ ही रोष भी बेरोजगार नौजवानों में ख़ूब है। एक तरफ नेता जी तो लाखों लोगों को नौकरी देने के दावे ठोंकते हैं, वहीं दूसरी तरफ नौकरी की तलाश में भटक रहे युवा सड़क से सदन तक ख़ाक छानते हैं। एक तो किसी सरकारी अमले में मुश्किल से भर्ती निकलती है और भर्ती निकलने के बाद उसके लिए होड़ लग जाती है। जैसे तैसे परीक्षा की तारीख आती है और परीक्षार्थी परीक्षा केन्द्रों पर पहुँच कर पेपर देते हैं और उसके बाद ही पता चलता है कि इस परीक्षा का पर्चा ही लीक हो गया है। हाय रे सरकारी तंत्र की लाचारी! एक पर्चा नहीं संभाला जाता। खैर अगर कभी कोई भर्ती परीक्षा सकुशल संपन्न भी हो जाती है उसका परिणाम अटक जाता है और परिणाम आ जाए तो भर्ती पर ही ग्रहण लग जाता है और फिर कोर्ट कचहरी का चक्कर शुरू हो जाता है। तमाम सरदर्दी को झेलते हुए छात्रों पर लगा रहता है "बेरोज़गार" होने का तमगा। बड़ी डिग्रियाँ हासिल करने के बाद भी जब युवा बेरोज़गार नज़र आते हैं तो ऐसे में याद आते हैं "कैलाश गौतम" और उनकी कवितायें। तो चलिए आज हम पढ़ते हैं और आनंद गौतम की कुछ कविताएँ। और सबसे पहले प्रस्तुत है पढ़े-लिखे हो कर भी बेरोज़गारी की मार झेल रहे नवयुवकों पर आधारित "बच्चू बाबू"...।
बच्चू बाबू एम.ए. करके सात साल झख मारे
खेत बेंचकर पढ़े पढ़ाई, उल्लू बने बिचारे
कितनी अर्ज़ी दिए न जाने, कितना फूँके तापे
कितनी धूल न जाने फाँके, कितना रस्ता नापे
लाई चना कहीं खा लेते, कहीं बेंच पर सोते
बच्चू बाबू हूए छुहारा, झोला ढोते-ढोते
उमर अधिक हो गई, नौकरी कहीं नहीं मिल पाई
चौपट हुई गिरस्ती, बीबी देने लगी दुहाई
बाप कहे आवारा, भाई कहने लगे बिलल्ला
नाक फुला भौजाई कहती, मरता नहीं निठल्ला
ख़ून ग़रम हो गया एक दिन, कब तक करते फाका
लोक लाज सब छोड़-छाड़कर, लगे डालने डाका
बड़ा रंग है, बड़ा मान है बरस रहा है पैसा
सारा गाँव यही कहता है बेटा हो तो ऐसा ।
वहीं अब पेश है अगली कविता जो बदलते परिवेश पर कटाक्ष करती हुई नज़र आती है...।
घर फूटे गलियारे निकले आँगन गायब हो गया
शासन और प्रशासन में अनुशासन ग़ायब हो गया ।
त्यौहारों का गला दबाया
बदसूरत महँगाई ने
आँख मिचोली हँसी ठिठोली
छीना है तन्हाई ने
फागुन गायब हुआ हमारा सावन गायब हो गया ।
शहरों ने कुछ टुकड़े फेंके
गाँव अभागे दौड़ पड़े
रंगों की परिभाषा पढ़ने
कच्चे धागे दौड़ पड़े
चूसा ख़ून मशीनों ने अपनापन ग़ायब हो गया ।
नींद हमारी खोई-खोई
गीत हमारे रूठे हैं
रिश्ते नाते बर्तन जैसे
घर में टूटे-फूटे हैं
आँख भरी है गोकुल की वृंदावन ग़ायब हो गया ।।
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