बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ!

आधुनिक युग की 'मीरा’ कही जाने वाली महादेवी वर्मा ने साहित्य के क्षेत्र में अपना बहुत बड़ा योगदान दिया है . महादेवी वर्मा की विरह से भरी हुई रचनाएँ आज भी लोगों को काफी पसंद आती है। महादेवी वर्मा की अधिक्तर रचनाएँ ऐसी है जो विरह का वर्णन करती है .इन्ही रचनाओं में से एक रचना है  "बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ!" जो एक ऐसी स्त्री के मन के भावों को व्यक्त कर रही है . जो अपने पति से दूर है .रचना में नायिका खुद को बीन और खुद को ही संगीत बता रही है . खुद को श्राप और खुद ही को वरदान भी बता रही है . पढ़िए पूरी रचना ....


बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ! 
नींद थी मेरी अचल निस्पंद कण-कण में, 
प्रथम जागृति थी जगत् के प्रथम स्पंदन में; 
प्रलय में मेरा पता पदचिह्न जीवन में, 
शाप हूँ जो बन गया वरदान बंधन में; 
कूल भी हूँ कूलहीन प्रवाहिनी भी हूँ! 
नयन में जिसके जलद वह तृषित चातक हूँ; 
शलभ जिसके प्राण में वह निठुर दीपक हूँ; 
फूल को उर में छिपाए विकल बुलबुल हूँ, 
एक होकर दूर तन से छाँह वह चल हूँ, 
दूर तुमसे हूँ अखंड सुहागिनी भी हूँ! 
आग हूँ जिसके ढुलकते बिंदु हिमजल के, 
शून्य हूँ जिसको बिछे हैं पाँवड़े पल के; 
पुलक हूँ वह जो पला है कठिन प्रस्तर में, 
हूँ वही प्रतिबिंब जो आधार के उर में; 
नील घन भी हूँ सुनहली दामिनी भी हूँ! 
नाश भी हूँ मैं अनंत विकास का क्रम भी, 
त्याग का दिन भी चरम आसक्ति का तम भी; 
तार भी, आघात भी, झंकार की गति भी, 
पात्र भी, मधु भी, मधुप भी, मधुर विस्मृति भी; 
अधर भी हूँ और स्मित की चाँदनी भी हूँ! 

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