दुनिया के वैज्ञानिकों को हैरान कर मोदी ने किया एलान, हम बन गए परमाणु 'सुपरपावर'
आज का दिन भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा! जी हां तमिलनाडु के कलपक्कम से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एलान किया है कि भारत का स्वदेशी प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अब 'क्रिटिकल' अवस्था में पहुंच गया है। सीधे शब्दों में कहें तो भारत ने परमाणु ऊर्जा की उस जादुई मशीन को चालू कर दिया है जो बिजली बनाने के साथ-साथ खुद अपना ईंधन भी पैदा करती है। यह सिर्फ एक वैज्ञानिक प्रयोग नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा आजादी का शंखनाद है। अब भारत रूस के बाद दुनिया का वह इकलौता देश बन गया है जिसने इस जटिल और खतरनाक तकनीक पर महारत हासिल कर ली है।
दरअसल, परमाणु विज्ञान की भाषा में 'क्रिटिकल' होने का मतलब है कि रिएक्टर के अंदर परमाणु विखंडन की शृंखला प्रतिक्रिया अब स्व-संचालित हो गई है। यानी अब यह भट्टी खुद-ब-खुद चलने लगी है। इस रिएक्टर की सबसे 'बड़ी खूबी यह है कि ये एक ऐसा जादुई चूल्हा है जिसमें आप जितना कोयला डालेंगे, खाना पकने के बाद उससे ज्यादा कोयला वापस मिल जाएगा! इसे 'फास्ट ब्रीडर' इसलिए कहते हैं क्योंकि यह परमाणु ईंधन का उपयोग करने के साथ-साथ उससे कहीं ज्यादा नया ईंधन पैदा करता है। यह तकनीक इतनी जटिल है कि तरल सोडियम को 550 डिग्री सेल्सियस पर संभालना पड़ता है, जहां एक छोटी सी चूक भी भारी पड़ सकती है। लेकिन भारतीय इंजीनियरों ने इस चुनौती को घुटनों पर ला दिया है।
लेकिन आपको बता दें यह कामयाबी अचानक नहीं मिली है। इसकी नींव 1950 के दशक में परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने रखी थी। भारत के पास यूरेनियम कम है लेकिन 'थोरियम' का दुनिया में सबसे बड़ा भंडार है। भाभा ने एक थ्री-स्टेज प्लान बनाया था। जिसमें....
पहला चरण: यूरेनियम से बिजली बनाना।
दूसरा चरण: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर के जरिए प्लूटोनियम और थोरियम से ईंधन बनाना।
तीसरा चरण: विशाल थोरियम भंडार का इस्तेमाल कर भारत को हजारों सालों के लिए सस्ती और साफ ऊर्जा देना।
वहीं कलपक्कम की यह सफलता दिखाती है कि भारत अब परमाणु ऊर्जा के उस तीसरे और अंतिम चरण के दरवाजे पर खड़ा है, जहाँ हम ऊर्जा के मामले में किसी भी देश के मोहताज नहीं रहेंगे। आपको बता दें इस 500 मेगावाट के विशालकाय रिएक्टर को भारत की परमाणु कंपनी 'भाविनी' ने तैयार किया है। साल 2004 में इसकी शुरुआत हुई थी, लेकिन कई तकनीकी चुनौतियों और देरी के बाद आज वैज्ञानिकों की मेहनत रंग लाई है। इसमें कूलेंट के रूप में तरल सोडियम का इस्तेमाल होता है, जो बिजली उत्पादन की प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाता है। पूर्व परमाणु ऊर्जा आयोग अध्यक्ष डॉ. अनिल काकोदकर ने इसे एक ऐतिहासिक छलांग बताया है, जो भारत को वैश्विक मंच पर सबसे मजबूत स्थिति में खड़ा करती है।
वहीं पीएम मोदी ने इस उपलब्धि को गर्व का क्षण और नागरिक परमाणु यात्रा का सबसे निर्णायक कदम बताया है। उन्होंने एक पोस्ट शेयर करते हुए लिखा कि यह सफलता हमें 2070 तक 'नेट-जीरो' के लक्ष्य तक पहुँचाने में मील का पत्थर साबित होगी। इससे न केवल बिजली सस्ती होगी, बल्कि परमाणु कचरा भी कम पैदा होगा। यह भारत के 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान की सबसे बड़ी जीत है।
देखा जाए तो भारत ने परमाणु जगत की सबसे कठिन परीक्षा फर्स्ट डिवीजन से पास कर ली है। कलपक्कम का यह रिएक्टर अब पूरे देश के लिए ऊर्जा का पावरहाउस बनेगा। कल तक जो देश हमें तकनीक देने से कतराते थे, आज वे भारत के वैज्ञानिकों का लोहा मान रहे हैं। रूस के बाद अब भारत वह शक्ति है जिसके पास भविष्य का ईंधन बनाने की चाबी है। वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की इस तपस्या ने यह साबित कर दिया है कि जब बात देश की ऊर्जा सुरक्षा की हो, तो भारत किसी भी बाधा को पार कर सकता है। अब वह दिन दूर नहीं जब भारत का कोना-कोना हमारे अपने थोरियम से बनी बिजली से जगमगाएगा।


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