भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता: भू-राजनीति के नए युग की दस्तक
भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता: भू-राजनीति के नए युग की दस्तक-
"सभी समझौतों की जननी" है भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता-
नई दिल्ली/ब्रुसेल्स — लगभग दो दशकों से लंबित भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को आखिरकार निर्णायक गति मिल गई है। “सभी समझौतों की जननी” कहे जा रहे इस करार को बाजार पहुंच की बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इसका महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। यह समझौता बदलती वैश्विक भू-राजनीति में रणनीतिक पुनर्संतुलन का संकेत देता है।
भारतीय वस्त्र, फार्मास्यूटिकल्स और मशीनरी तक कई क्षेत्रों में व्यापार को बढ़ावा मिलने की है उम्मीद-
इस एफटीए के तहत भारत यूरोपीय संघ को निर्यात होने वाले 96.6 प्रतिशत सामानों पर शुल्क समाप्त या कम करेगा, जबकि यूरोपीय संघ व्यापार मूल्य के आधार पर भारतीय वस्तुओं के 99.5 प्रतिशत पर टैरिफ में कटौती करेगा। इससे जर्मन लग्जरी कारों से लेकर भारतीय वस्त्र, फार्मास्यूटिकल्स और मशीनरी तक, कई क्षेत्रों में व्यापार को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
रणनीतिक स्वायत्तता की नीति को देता है मजबूती-
विशेषज्ञों के अनुसार, समझौते को 2026 की शुरुआत में अंतिम रूप देने के पीछे आर्थिक कारणों से अधिक भू-राजनीतिक दबाव रहे। अमेरिका की अनिश्चित व्यापार नीतियों, रूस-यूक्रेन युद्ध और चीन के बढ़ते प्रभाव ने भारत और यूरोपीय संघ दोनों को वैकल्पिक, भरोसेमंद साझेदारियों की ओर देखने के लिए प्रेरित किया।
यूरोपीय संघ के लिए यह करार उसकी “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति को मजबूती देता है, जिससे वह अमेरिका और चीन पर निर्भरता कम कर सके।
एफटीए एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ते कदम का प्रतीक-
वहीं भारत के लिए यह समझौता उसकी आक्रामक व्यापार कूटनीति का विस्तार है, जो पहले ही ऑस्ट्रेलिया, यूएई, ब्रिटेन और अन्य देशों तक पहुंच चुकी है।इस एफटीए में केवल वस्तुओं का व्यापार ही नहीं, बल्कि सेवाएं, डिजिटल व्यापार, बौद्धिक संपदा, सीमा शुल्क सहयोग और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती जैसे पहलू भी शामिल हैं। समुद्री सुरक्षा और रक्षा सहयोग के बढ़ते तालमेल के साथ यह समझौता स्पष्ट करता है कि व्यापार और रणनीति अब अलग-अलग नहीं रहे।विश्लेषकों का मानना है कि भारत-ईयू एफटीए एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ते कदम का प्रतीक है, जहां अलगाव नहीं, बल्कि सहयोग ही आर्थिक सुरक्षा और स्थिरता की कुंजी बनता जा रहा है।

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