“नोट दो, वोट लो”: भारत के चुनावों में कैश-ट्रांसफर का नया फॉर्मूला
सावधान हो जाइए! क्योंकि देश की राजनीति में एक नया और सबसे कामयाब शॉर्टकट फॉर्मूला हिट हो गया है...और वो है....."नोट दो, वोट लो!" जी हां मौजूदा वक्त में चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की चुनावी बिसात बिछ चुकी है, लेकिन इस बार मुकाबला विकास के मुद्दों पर नहीं, बल्कि सीधे बैंक खातों में पहुंचने वाली मोटी रकम पर टिका है। आचार संहिता की धमक से ठीक पहले मुख्यमंत्री अपनी तिजोरियों के मुंह खोल चुके हैं। कोई महिलाओं को 9000 दे रहा है, तो कोई बुजुर्गों की पेंशन में हजारों की बढ़ोतरी कर रहा है। आपको बता दें मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने 'भोग बिहू' के नाम पर ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला कि विपक्षी देखते रह गए। प्रदेश की 40 लाख महिलाओं के खाते में सीधे 9-9 हजार रुपये डाल दिए गए। एक ही दिन में 3600 करोड़ रुपये स्वाहा!
आपको जानकर हैरानी होगी कि यह राज्य की कुल टैक्स कमाई का 10% हिस्सा है। वहीं दूसरी तरफ तमिलनाडु में एमके स्टालिन की सरकार ने पोंगल के नाम पर 13,000 करोड़ रुपये का 'गिफ्ट हैंपर' खोला है। 2.22 करोड़ परिवारों को 3000 रुपये नकद, चावल, चीनी और गन्ना बांटा गया। इतना ही नहीं, 1.3 करोड़ महिलाओं को पहले ही 5000-5000 रुपये भेजे जा चुके हैं। यानी स्टालिन सरकार ने अकेले इस साल 9556 करोड़ रुपये सिर्फ कैश बांटने में फूंक दिए! वहीं पश्चिम बंगाल में 15 साल से काबिज ममता दीदी ने बीजेपी के 'लाडली बहना' वाले दांव को ही अपना हथियार बना लिया है। उन्होंने महिलाओं की मदद को 500 से बढ़ाकर 1500 और 1700 रुपये कर दिया है। इसके अलावा बेरोजगार युवाओं के लिए 1500 रुपये महीना और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए अलग से बोनस! बंगाल की इन योजनाओं का कुल बिल 18,600 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। वहीं केरल की लेफ्ट सरकार ने अपनी सामाजिक सुरक्षा पेंशन को बढ़ाकर 2000 रुपये कर दिया है, जिस पर सालाना 2976 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
आपको बता दें सत्ताधारी तो खजाना लुटा ही रहे हैं, लेकिन विपक्ष भी पीछे नहीं है। तमिलनाडु में AIADMK ने मुफ्त फ्रिज बांटने का दांव चला है। वहीं, पहली बार चुनावी मैदान में उतरे साउथ सुपरस्टार थलपति विजय की पार्टी ने तो 'सपनों का पिटारा' ही खोल दिया है। उनके वादों में महिलाओं को 2500 रुपये महीना, सिल्क साड़ी, शादी के लिए सोना, और यहां तक कि नवजात लड़कियों के लिए सोने की अंगूठी शामिल है! देखा जाए तो यह चुनावी फॉर्मूला हिट तो है, लेकिन इसकी कीमत आने वाली पीढ़ियां चुकाएंगी। जी हां देश के 15 राज्यों में ऐसी योजनाएं चल रही हैं, जिन पर सालाना 2.46 लाख करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। हालत यह है कि कई राज्यों को स्कूल, अस्पताल और सड़कों जैसे विकास कार्यों का बजट काटकर इन 'कैश ट्रांसफर' योजनाओं में डालना पड़ रहा है। भले ही जनता के लिए यह दौर 'दिवाली' जैसा है, जहां हर तरफ से तोहफे आ रहे हैं। लेकिन याद रखिए, जब चुनाव खत्म होंगे और सरकारें बन जाएंगी, तो यही मुफ्त के पैसे महंगाई और टैक्स के जरिए आपकी दूसरी जेब से निकाले जाएंगे। अब देखना दिलचस्प होगा कि जनता इन नोटों की बारिश में भीगकर किसे सत्ता के शिखर पर बैठाती है और किसे थैंक्यू बोलकर घर भेजती है।
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