प्याज सस्ता, चीनी महंगी: दोहरी नीति पर सवाल

चीनी के बढ़ते दामों ने आम जनता का बजट बिगाड़ा है, वहीं अब प्याज की कीमतों ने भी लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। खुले बाजार में प्याज करीब 60-70 रुपये किलो तक पहुंचने पर सरकार बफर स्टॉक से करीब 35 रुपये किलो की दर पर प्याज बेच रही है। सवाल यह है कि जब प्याज की महंगाई पर सरकार सरकारी स्टॉक बाजार में उतार सकती है, तो चीनी की कीमतों में तेजी के समय ऐसा ही हस्तक्षेप क्यों नहीं किया जाता? आम उपभोक्ता को राहत देने के लिए जरूरी खाद्य वस्तुओं पर एक समान नीति की जरूरत महसूस होती है।

प्याज और चीनी पर अलग-अलग रवैया

प्याज की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए NAFED के जरिए खरीदा गया प्याज ‘कांदा एक्सप्रेस’ के माध्यम से अलग-अलग शहरों तक पहुंचाया जा रहा है। दूसरी ओर, चीनी की कीमतों में तेजी आने पर सरकार आमतौर पर मासिक रिलीज कोटा और स्टॉक लिमिट जैसे प्रशासनिक उपायों पर निर्भर रहती है। चीनी उद्योग में बड़े सहकारी और निजी मिलों की मजबूत आर्थिक भूमिका है, जबकि प्याज उत्पादक किसान अधिकतर छोटे और असंगठित हैं। ऐसे में दोनों क्षेत्रों में सरकारी हस्तक्षेप के तरीके को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

उद्योग को मुनाफा, किसान पर नियंत्रण

कृषि और औद्योगिक उत्पादों की कीमत तय करने की प्रक्रिया में बड़ा अंतर दिखाई देता है। कंपनियां अपनी उत्पादन लागत, ब्रांड वैल्यू और मुनाफे को ध्यान में रखकर कीमत तय करती हैं, जबकि किसान की फसल की कीमत बाजार, सरकारी नीतियों, आयात-निर्यात फैसलों और सरकारी हस्तक्षेप से प्रभावित होती है। किसान खाद, बीज, कीटनाशक, डीजल और मशीनरी महंगी दरों पर खरीदता है, लेकिन फसल बेचते समय उसकी कीमत पर उसका नियंत्रण सीमित रहता है। यही स्थिति कृषि नीति में मौजूद विरोधाभास को सामने लाती है।

महंगाई रोकने की कीमत कौन चुकाए?

जब प्याज के दाम गिरकर करीब 2 रुपये किलो तक पहुंचते हैं, तब किसानों को राहत देने के लिए प्रभावी कदमों की कमी दिखाई देती है, लेकिन कीमत बढ़ने पर बाजार में सरकारी स्टॉक उतारकर उन्हें नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है। इससे उपभोक्ताओं को तत्काल राहत मिल सकती है, लेकिन किसानों को बेहतर कीमत मिलने की संभावना प्रभावित हो सकती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारतीय किसान परिवारों की औसत मासिक आय करीब 10,218 रुपये है। ऐसे में महंगाई नियंत्रित करने की नीति बनाते समय किसान की आय और उत्पादन लागत को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

उपभोक्ता और किसान दोनों का हित जरूरी

यदि सरकार आम लोगों को सस्ता खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराना चाहती है, तो राहत का पूरा बोझ किसान की उपज की कीमत कम करके नहीं डाला जाना चाहिए। सरकार खुले बाजार से किसानों को उचित और लाभकारी दाम देकर उनकी आय सुरक्षित कर सकती है और जरूरतमंद उपभोक्ताओं को सब्सिडी के जरिए कम कीमत पर खाद्य वस्तुएं उपलब्ध करा सकती है। इससे किसान और उपभोक्ता दोनों को राहत मिल सकती है। कृषि नीति का उद्देश्य केवल शहरों में सस्ती खाद्य वस्तुएं उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि किसानों की लागत, जोखिम और आय का भी संतुलन बनाए रखना होना चाहिए।

किसान को कब मिलेगा उसका उचित हक?

प्याज और चीनी की कीमतों को लेकर सामने आया अंतर यह सवाल खड़ा करता है कि देश में महंगाई नियंत्रण की नीति उपभोक्ता और किसान के बीच संतुलन कैसे बनाएगी। किसान की फसल की कीमत बढ़ने पर तत्काल नियंत्रण और कीमत गिरने पर सीमित राहत, दोनों स्थितियां उसकी आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती हैं। जरूरत ऐसी नीति की है जिसमें उपभोक्ता को उचित कीमत पर जरूरी खाद्य सामग्री मिले और किसान को भी उसकी मेहनत, लागत और जोखिम के अनुरूप लाभकारी मूल्य प्राप्त हो। यही संतुलन कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में प्रभावी कदम हो सकता है।

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