भारत का रहस्यमयी गांव: जहाँ हनुमान जी का नाम लेना भी मना!

भारत आस्था और परंपराओं का देश है यहाँ मंदिरों की घंटियाँ, भजन और पूजा-पाठ रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। खासकर हनुमान जी, जिन्हें संकटमोचन कहा जाता है, उनकी भक्ति पूरे देश में बड़े उत्साह से की जाती है। मंगलवार और शनिवार को उनके मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है और लोग अपने दुख-दर्द दूर करने की कामना करते हैं।

लेकिन इसी देश में एक ऐसी जगह भी है, जहाँ यह परंपरा बिल्कुल उलट दिखाई देती है। यहाँ न तो हनुमान जी की पूजा होती है और न ही उनका नाम लिया जाता है बल्कि अगर कोई ऐसा कर दे, तो उसे गाँव से बाहर तक जाने को कहा जाता है। सुनने में यह बात जितनी अजीब लगती है, उतनी ही रोचक इसकी कहानी भी है।

यह अनोखी परंपरा द्रोणागिरि गांव में देखने को मिलती है, जो हिमालय की शांत वादियों में बसा हुआ है। इस गाँव के लोग आज भी सदियों पुरानी मान्यताओं को पूरी आस्था के साथ निभाते हैं।

स्थानीय कथा के अनुसार, इसका संबंध रामायण के समय से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि जब युद्ध के दौरान लक्ष्मण जी घायल होकर मूर्छित हो गए थे, तब उन्हें बचाने के लिए संजीवनी बूटी की आवश्यकता पड़ी। इसी जड़ी-बूटी की तलाश में हनुमान द्रोणागिरि पर्वत तक पहुँचे। लेकिन सही बूटी पहचान न पाने के कारण उन्होंने पूरा पर्वत ही उठाकर ले जाने का निर्णय लिया।

यहीं से इस कथा में एक अलग मोड़ आता है। गाँव के लोगों का मानना है कि पर्वत उठाने से पहले हनुमान जी ने स्थानीय देवता लाटू देवता से अनुमति नहीं ली थी, जो उस स्थान को अत्यंत पवित्र मानते थे। इसे देवता का अपमान समझा गया, और तभी से गाँव के लोग इस घटना को लेकर नाराज बताए जाते हैं।

इस मान्यता का प्रभाव आज भी साफ दिखाई देता है। द्रोणागिरि में न तो हनुमान जी का कोई मंदिर है और न ही उनके नाम का उच्चारण किया जाता है। लोग “हनुमान”, “बजरंग” या “संकटमोचन” जैसे शब्दों से भी दूरी बनाए रखते हैं। हालांकि, वे भगवान राम की पूजा पूरी श्रद्धा से करते हैं, लेकिन हनुमान जी के प्रति उनकी यह अलग मान्यता आज भी कायम है।

यही वजह है कि यह गाँव अपनी अनोखी परंपरा और मान्यता के कारण पूरे देश में एक अलग पहचान रखता है जहाँ आस्था का रूप बाकी जगहों से बिल्कुल अलग नजर आता है।

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