ईरान: असंतोष से खतरनाक सवाल तक

 

ईरान आज फिर एक संकट के दौर से गुजर रहा है—आर्थिक मंदी, सामाजिक असंतोष, युवाओं का विरोध और धार्मिक शासन से मोहभंग। इस बीच अंतरराष्ट्रीय मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच वही पुराना सवाल दोबारा उठ रहा है: क्या ईरान टूट सकता है?

ईरान की जटिलता केवल धार्मिक मतभेदों में नहीं, बल्कि इसकी जातीय संरचना में छिपी है। देश की लगभग 87.6 मिलियन आबादी में 61% फारसी हैं, जो राष्ट्रीय पहचान का आधार हैं। इसके बाद आते हैं अजरबैजानी (17-18 मिलियन), कुर्द (लगभग 10 मिलियन), लूरा, बलोच, अरब और तुर्कमेन। कुर्दों और बलोचों में ऐतिहासिक संघर्ष, उपेक्षा और दमन ने अलगाव की भावना को जन्म दिया है। खासतौर पर कुर्द समुदाय की साझा भाषा, संस्कृति और स्वतंत्र राष्ट्र की अधूरी आकांक्षा उन्हें संभावित अलगाववादी आंदोलन का केंद्र बनाती है।

फिर भी, ईरान की अधिकांश जातीय समूह अभी भी पूर्ण विभाजन की जगह राजनीतिक अधिकार, सांस्कृतिक सम्मान और आर्थिक समानता चाहते हैं। इसलिए खामेनेई के बाद भी ईरान का भविष्य केवल सत्ता की मजबूती और जातीय समझ पर निर्भर करेगा।

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