ईरान-इजराइल की जंग, लखनऊ में 1500 करोड़ का व्यापार स्वाहा, ठप कारखाने!

सरहदों पर जब मिसाइलें चलती हैं, तो उसका असर सिर्फ नक्शों पर नहीं, बल्कि आम आदमी की थाली और छोटे उद्यमियों की रोजी-रोटी पर भी पड़ता है। ईरान-इजराइल युद्ध ने एक तरफ खाड़ी देशों में ड्रोन हमलों और मौतों का तांडव मचाया है, तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के उद्योगों की कमर तोड़ दी है। 1500 करोड़ का नुकसान, कच्चे माल की दोगुनी कीमतें और ठप होते कारखाने...यह युद्ध अब सिर्फ दो देशों का नहीं, बल्कि हर उस इंसान का है जिसकी जेब पर डाका पड़ रहा है। 

आपको बता दें ईरान-इजराइल युद्ध का सबसे दर्दनाक असर लखनऊ के औद्योगिक इलाकों में दिख रहा है। मार्च से अब तक विभिन्न उद्योगों को 1000 करोड़ रुपये से अधिक की चपत लग चुकी है। अकेले प्लास्टिक सेक्टर को 500 करोड़ से ज्यादा का नुकसान हुआ है। जो प्लास्टिक दाना पहले 90-100 रुपये किलो मिलता था, वह अब 200 रुपये के पार पहुंच चुका है। कच्चे माल की किल्लत और आसमान छूती कीमतों के कारण करीब 4000 प्लास्टिक इकाइयों का उत्पादन घटकर महज 20 फीसदी रह गया है। वहीं साबुन, गत्ता, बेकरी और रसायन जैसे उद्योगों का बाजार 80 फीसदी तक गिर चुका है। उद्यमियों के सामने अब अपनी और अपने कर्मचारियों की रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। 

वहीं समुद्र के रास्ते होने वाला व्यापार अब 'मौत का रास्ता' बन चुका है। ब्रिटेन की पहल पर हुई 60 देशों की बैठक में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने एक कड़वा सच दुनिया के सामने रखा। भारत ने दो टूक कहा है कि इस संकट में सबसे ज्यादा नुकसान भारत के नागरिकों का हुआ है। जहां फिलीपींस ने ईरान से बातचीत कर अपने जहाजों के लिए सुरक्षित रास्ता निकाल लिया है, वहीं बाकी दुनिया अभी भी 'होर्मुज स्ट्रेट' को खुलवाने के लिए संघर्ष कर रही है। 

वहीं इस जंग के बीच अमेरिका में बड़ी राजनीतिक और सैन्य उथल-पुथल देखने को मिल रही है। जी हां रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने आर्मी चीफ जनरल रैंडी जॉर्ज समेत तीन शीर्ष अधिकारियों को पद से हटाने का फैसला कर सबको चौंका दिया है। राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान डील को लेकर अपने अंदाज में कहा कि "अगर डील सफल हुई तो क्रेडिट मेरा, और फेल हुई तो इसके जिम्मेदार उपराष्ट्रपति जेडी वैंस होंगे।" 

वहीं ईरान की जिद है कि वह दबाव में कोई समझौता नहीं करेगा, तो दूसरी तरफ दुनिया की महाशक्तियां अपनी रणनीति बदलने में जुटी हैं। लेकिन इन सबके बीच पिस रहा है वो छोटा कारोबारी और वो मजदूर, जिसका इस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है। अगर होर्मुज का रास्ता जल्द नहीं खुला और कच्चे माल की सप्लाई बहाल नहीं हुई, तो लखनऊ के हजारों परिवारों के चूल्हे बुझ सकते हैं। यह युद्ध अब बम-बारूद से निकलकर बाजारों में घुस चुका है। अब देखना यह है कि दुनिया के रहनुमा इस आग को बुझाते हैं या अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए इसे और हवा देते हैं। 

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