लेबनान पर मुकरा अमेरिका, अब इजरायल के बारूद से दहलेगा ईरान
दुनिया इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठी है और माचिस की तीली जल चुकी है! कहने को तो पाकिस्तान की मध्यस्थता से ईरान और अमेरिका के बीच 15 दिन के सीजफायर का ढोंग रचा गया है, लेकिन हकीकत ये है कि बातचीत शुरू होने से पहले ही गोलियों की गूंज और धमकियों की दहाड़ ने इस समझौते के परखच्चे उड़ा दिए हैं। जी हां एक तरफ पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम शहबाज शरीफ अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, तो दूसरी तरफ इजरायल लेबनान को कब्रिस्तान बनाने पर तुला है। डोनाल्ड ट्रंप ने तो ईरान के गले पर तलवार ही रख दी है कि या तो सुधर जाओ, वरना मिटा दिए जाओगे! ऐसे में सवाल है कि क्या पाकिस्तान का 'शांतिदूत' बनने का सपना एक बहुत बड़ा 'पोपट' साबित होने वाला है? क्या लेबनान की आग इस कच्चे समझौते को जलाकर खाक कर देगी? आज बात करेंगे उस इंटरनेशनल धोखे की, जिसने पूरी दुनिया की सांसें अटका दी हैं!
ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता में जिस अस्थायी शांति का गुब्बारा फुलाया गया था, उसकी हवा निकलने लगी है। शुक्रवार को इस्लामाबाद में बातचीत की टेबल सजने वाली है, लेकिन उससे पहले ही दावों और जवाबी दावों ने इस समझौते को विवादों के दलदल में धकेल दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी शैली में साफ कर दिया है कि उन्हें ईरान पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है। ट्रंप ने 'ट्रुथ सोशल' पर गर्जना करते हुए कहा कि जब तक ईरान के साथ कोई असली और पक्का समझौता नहीं हो जाता, तब तक अमेरिकी नौसेना के घातक जहाज, मिसाइलें और सैनिक ईरान की सरहद को घेरे रहेंगे। ट्रंप ने दो-टूक कहा कि ईरान को परमाणु बम नहीं बनाने देंगे और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर किसी भी तरह का ईरानी कंट्रोल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।अगर डील टूटी, तो ईरान पर ऐसी कार्रवाई होगी जो इतिहास ने कभी नहीं देखी होगी।
वहीं इस पूरे ड्रामे का सबसे बड़ा ट्विस्ट है 'लेबनान'। पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ और राजदूत रिजवान सईद शेख का दावा है कि सीजफायर की शर्तों में लेबनान में शांति भी शामिल थी। लेकिन अमेरिका ने पाकिस्तान के इस दावे को सरेआम झूठा करार दे दिया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बुडापेस्ट में धमाका करते हुए कहा कि ईरानियों को गलतफहमी हुई है, हमने लेबनान को लेकर कभी कोई वादा नहीं किया।
उधर इजरायल ने भी लेबनान में हमले तेज कर दिए हैं और कहा है कि उनका सीजफायर सिर्फ ईरान तक सीमित है। आपको बता दें मजे की बात तो पाकिस्तान के भीतर चल रहा तमाशा है। एक तरफ दुनिया इस समझौते को शक की निगाह से देख रही है, वहीं पाकिस्तानी मीडिया में शहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर को नोबेल शांति पुरस्कार देने की मांग उठ रही है। पैनलिस्ट टीवी पर बैठकर शेखी बघार रहे हैं कि पाकिस्तान ने दुनिया को महायुद्ध से बचा लिया। लेकिन एक रिपोर्ट ने पाकिस्तान की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान कोई स्वतंत्र मध्यस्थ नहीं, बल्कि व्हाइट हाउस का महज एक चिट्ठी-पत्री पहुंचाने वाला डाकिया था। असली बात तो जनरल मुनीर और ट्रंप के बीच हुई थी, जबकि शहबाज शरीफ बस क्रेडिट लेने के लिए ट्विटर पर कूद पड़े। वहीं इन सब के बीच ईरान ने भी अब कड़े तेवर अपना लिए हैं। उसने अमेरिका को अल्टीमेटम दे दिया है कि अगर लेबनान में इजरायली हमले नहीं रुके, तो वह सीजफायर को ठुकरा देगा और बातचीत की मेज से उठ जाएगा। ईरान का कहना है कि लेबनान और ईरान को अलग करके नहीं देखा जा सकता। अब सवाल यह है कि अगर ईरान पीछे हटता है, तो क्या ट्रंप अपनी धमकियों को हकीकत में बदलेंगे?
देखा जाए तो शांति की बातें सिर्फ कागजों पर हैं, जबकि जमीनी हकीकत बारूद की गंध से भरी हुई है। पाकिस्तान ने जिस सीजफायर का सेहरा अपने सिर बांधा था, वो अब उसके गले की फांस बनता जा रहा है। अमेरिका मुकर चुका है, इजरायल हमलावर है, ईरान भड़का हुआ है और ट्रंप की उंगली ट्रिगर पर है। ऐसे में सवाल है कि क्या 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में होने वाली ये मुलाकात दुनिया को चैन की सांस देगी या फिर ये बातचीत एक और भीषण युद्ध का बहाना बनेगी? वहीं पाकिस्तान के नोबेल के अरमानों का क्या होगा? यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन इतना तय है कि ट्रंप के रहते ईरान के लिए राह आसान नहीं होने वाली।


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