जगजीत सिंह की सदाबहार ग़ज़लें

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो / कैफ़ी आज़मी

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो

आंखों में नमी हंसी लबों पर
क्या हाल है क्या दिखा रहे हो

बन जाएंगे ज़हर पीते पीते
ये अश्क जो पीते जा रहे हो

जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है
तुम क्यूं उन्हें छेड़े जा रहे हो

रेखाओं का खेल है मुक़द्दर
रेखाओं से मात खा रहे हो 

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं / कैफ़ी आज़मी

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं

तू अपने दिल की जवां धड़कनों को गिन के बता
मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं

वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है
उस एक पल का तुझे इंतिज़ार है कि नहीं

तिरी उमीद पे ठुकरा रहा हूं दुनिया को
तुझे भी अपने पे ये ए'तिबार है कि नहीं


तेरे बारे में जब सोचा नहीं था / मेराज फ़ैज़ाबादी

तेरे बारे में जब सोचा नहीं था
मैं तन्हा था मगर इतना नहीं था

तेरी तस्वीर से करता था बातें
मेरे कमरे में आईना नहीं था

समंदर ने मुझे प्यासा ही रखा
मैं जब सहरा में था प्यासा नहीं था

मनाने रूठने के खेल में हम
बिछड़ जाएँगे ये सोचा नहीं था

सुना है बंद कर लीं उसने आँखें
कई रातों से वो सोया नहीं था

मैं तन्हा था मगर इतना नहीं था
तेरे बारे में जब सोचा नहीं था

तेरे आने की जब ख़बर महके / नवाज़ देवबंदी

तेरे आने की जब ख़बर महके
तेरी ख़ुशबू से सारा घर महके

शाम महके तिरे तसव्वुर से
शाम के बा'द फिर सहर महके

रात भर सोचता रहा तुझ को
ज़ेहन-ओ-दिल मेरे रात भर महके

याद आए तो दिल मुनव्वर हो
दीद हो जाए तो नज़र महके

वो घड़ी-दो-घड़ी जहाँ बैठे
वो ज़मीं महके वो शजर महके

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