धूप-तरी की रोशनी में जानकी वल्लभ शास्त्री
हिंदी साहित्य के विशिष्ट कवि, विद्वान और संस्कृत–हिंदी के मर्मज्ञ जानकी वल्लभ शास्त्री (1895–1976) का जन्मदिवस हमें उनके अमूल्य साहित्यिक योगदान को स्मरण करने का अवसर प्रदान करता है। बिहार में जन्मे शास्त्री जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी कविता को भावनात्मक गहराई, शास्त्रीय गरिमा और सौंदर्य-बोध से समृद्ध किया। वे छायावादोत्तर काव्यधारा के ऐसे रचनाकार थे जिनकी काव्य-दृष्टि पर संस्कृत परंपरा की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
शास्त्री जी का जीवन अध्यापन, साधना और साहित्य-सेवा को समर्पित रहा। उनकी कविताओं में प्रेम, विरह, प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत कोमल और संगीतात्मक रूप देखने को मिलता है। भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी भावों की दृष्टि से सहज और प्रभावशाली है।
जानकी वल्लभ शास्त्री की कविता ‘धूप-तरी’ उनके काव्य-संसार की एक अत्यंत भावपूर्ण और प्रेरक रचना है। इस कविता में धूप जीवन की उजास, आशा और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक बनकर सामने आती है। अंधकार, संघर्ष और थकान के बीच भी आगे बढ़ने का संदेश देती यह कविता मानवीय संवेदनाओं को गहराई से स्पर्श करती है। शास्त्री जी की जन्मतिथि के अवसर पर हम उनकी इसी कविता को लेकर आए हैं, जो जीवन में प्रकाश, विश्वास और सौंदर्य को महसूस करने की प्रेरणा देती हैं और उनके सशक्त काव्य-शिल्प का परिचय कराती है.....
धूप-तरी
धूप-तरी तिरती कुहरी की झील में
जैसे उजली बदली अम्बर नील में।
पुरवाई आई खेतों की ओर से
गई तरी झकझोर किरन की डोर से
खनक रही सी नीरवता पतझार की,
महक रही केवलता सूनी डार की,
साँस फँसी ठिठुरी धरती की कील में,
धूप-तरी तिरती कुहरी की झील में।
गुँथा-गुँथा-सा दुख से सुख है चल रहा,
किससे मिलने को मन आज मचल रहा!
जीवन-मधु की कौन बूँद निष्प्राण है?
कौन मौन क्षण अपने में सुनसान है?
कर्दम में जो मुँदै, खुलेंगे खील में।
धूप तरी तिरती कुहरी की झील में।
अँकुराए संकल्प फुनगियों में कहीं,
ऊँची दृष्टि, सँवर, नवीन नीचे नहीं।
गिरि-शिखरों पर जो गहराता रंग है,
वह उछाल पाती क्या सिंधु-तरंग है!
फूल भरें परिमल शूलों के शील में!
धूप-तरी तिरती कुहरी की झील में!


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