एक ऐसी जगह , जहां लगता है भूतों का मेला

आज जहां , एक तरफ जहां SpaceX ने सुनीता विलियम्स को अंतरिक्ष से धरती पर सुरक्षित उतारकर विज्ञान और तकनीक की नई ऊंचाईयों को छुआ है, वहीं दूसरी ओर खंडवा में एक ऐसी दुनिया भी है, जहां विज्ञान से ज्यादा तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास का बोलबाला है। यह जगह है – सैलानी दरगाह, जहां बुरी आत्माओं के खिलाफ एक अजीबो-गरीब अदालत लगती है। जहां एक ओर अंतरिक्ष में इंसान के कदम पड़ चुके हैं, वहीं दूसरी ओर खंडवा में लोग बुरी आत्माओं से छुटकारा पाने के लिए इस दरगाह की ओर रुख करते हैं।
सैलानी दरगाह पर होली से रंग पंचमी तक एक ऐसा मेला लगता है, जहां देश भर से लोग आते हैं, खासकर वे लोग जो भूत-प्रेत और बुरी आत्माओं से परेशान हैं। यकीन मानिए, ये लोग दुखों और असमंजस में होते हुए इस दरगाह तक पहुंचते हैं, लेकिन खुशी-खुशी लौटते हैं। लोग कहते हैं कि यहां एक चमत्कार होता है – बाबा सैलानी की अदालत में बुरी आत्माओं की पेशी होती है, और उन्हें सजा सुनाई जाती है, जिसका असर सीधे उनके शरीर पर पड़ता है। यह अदालत न तो दीवानी है, न फौजदारी – यहां तो बुरी आत्माओं का न्याय होता है।
अब जरा सोचिए, इस अद्भुत दरगाह में क्या दृश्य होते होंगे। कुछ लोग तो जंजीरों में बंधे हुए आते हैं, कुछ महीनों से प्रेत बाधा से पीड़ित होते हैं, और उनके परिवार वाले उन्हें दूर-दूर से लेकर आते हैं। जैसे ही ये लोग दरगाह की लोहे की दीवार को छूते हैं, अचानक अजीब घटनाएं घटने लगती हैं। बुरी शक्तियां तांडव करती हैं, गुनाहों को स्वीकार करती हैं और बाबा सैलानी से माफी मांगती हैं। यकीन मानिए, ये नजारे किसी भी सुपरनेचुरल थ्रिलर फिल्म से कम नहीं होते!
सैलानी दरगाह का इतिहास भी किसी रहस्यमयी कहानी से कम नहीं। यह दरगाह 1939 में बनी थी और लगभग 86 साल पुरानी है। और यह जगह सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक समाजिक और सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल भी है। हर साल होली से रंग पंचमी तक यहां मेले में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई – सभी धर्मों के लोग एक साथ आते हैं।
कहते हैं, अगर कोई लगातार पांच गुरुवार तक यहां आकर बाबा की दरगाह पर माथा टेकता है, तो उसे अजीब-अजीब तरीके से राहत मिलती है। यहां मुर्गे और बकरे की बलि दी जाती है, जिन्हें बाबा के नाम पर अर्पित किया जाता है। मगर एक सवाल ये है कि एक ओर जहां विज्ञान ने इंसान को अंतरिक्ष में भेज दिया है, वहीं दूसरी ओर यहां के लोग आज भी ऐसी मान्यताओं पर विश्वास करते हैं, क्या वाकई ये ठीक है ... आखिर एक ओर जहां हम अंतरिक्ष में कदम रख चुके हैं, जहां बेटियां आकाश में बुलंदी के झंडे गाड़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर क्यों कुछ महिलाएं और लोग अंधविश्वास के जाल में फंसे हुए हैं?
कुल मिलाकर देखा जाए तो समझा जा सकता है कि एक ओर विज्ञान और तकनीक की दुनिया नई ऊंचाइयों को छू रही है, वहीं दूसरी ओर अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र की यह पुरानी परंपरा आज भी हमारे समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए है। क्या हम इस चक्रव्यूह से बाहर निकल पाएंगे? क्या हम अपनी सोच को और व्यापक बनाएंगे, या फिर हर कदम पर अंधविश्वास के ये काले बादल हमारी राहें घेरते रहेंगे? जब पूरी दुनिया अंतरिक्ष में नयी संभावनाओं की ओर कदम बढ़ा रही है, तो क्या हमें अपने अंदर के अंधेरे को खत्म करने की हिम्मत जुटानी चाहिए? हम ये नहीं कह रहे की खंडवा में लगने वाले मेला नहीं लगना चाहिए ..मगर क्या वाकई ऐसे मेंलों से कोई निष्कर्ष निकलता है , या नहीं ये जरूर सोचने का विषय है .....
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