Father Surname Tradition: मां जन्म देती है, फिर भी बच्चे को क्यों मिलता है पिता का नाम?

BY UJJWAL SINGH 

भारत समेत दुनिया के अधिकांश समाजों में बच्चों को पिता का उपनाम (Surname) देने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. हालांकि यह सवाल अक्सर उठता है कि जब बच्चे को जन्म मां देती है, तो पहचान पिता के नाम से क्यों जुड़ती है? हाल ही में यह मुद्दा फिर चर्चा में आया जब महाराष्ट्र विधानसभा के बजट सत्र के दौरान बच्चों की पहचान और उपनाम को लेकर बहस हुई. दरअसल, राज्य सरकार ने महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026 पेश किया, जिसमें अवैध धार्मिक धर्मांतरण से हुई शादी और उससे जन्मे बच्चों की धार्मिक पहचान से जुड़े प्रावधान शामिल किए गए हैं. इस चर्चा के बीच यह समझना जरूरी हो जाता है कि बच्चों को पिता का नाम देने की परंपरा कब और क्यों शुरू हुई.

पितृसत्तात्मक समाज की परंपरा

इतिहासकारों के अनुसार बच्चों को पिता का नाम देने की परंपरा पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी हुई है. प्राचीन और मध्यकालीन समाजों में परिवार की संरचना पुरुषों के इर्द-गिर्द बनी होती थी. पिता को परिवार का मुखिया माना जाता था, इसलिए परिवार की पहचान और उपनाम भी पुरुष वंश से ही आगे बढ़ाया जाता था। यही कारण है कि ज्यादातर समाजों में बच्चे को पिता का ही नाम दिया जाने लगा.

वंश और विरासत से जुड़ा कारण

पिता का उपनाम देने के पीछे एक बड़ा कारण संपत्ति और विरासत से जुड़ा हुआ था. पहले जमीन, धन, उपाधि और संपत्ति आमतौर पर पिता से बेटे को मिलती थी. ऐसे में उपनाम यह बताने का एक सामाजिक और कानूनी तरीका था कि बच्चा किस परिवार या वंश से संबंधित है और उसे किस संपत्ति पर अधिकार मिल सकता है.

सामाजिक पहचान और वैधता

कई ऐतिहासिक समाजों में बच्चे को पिता के परिवार का हिस्सा माना जाता था. पिता का नाम बच्चे को सामाजिक पहचान और वैधता देता था. इससे समाज के भीतर उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और सामाजिक स्थिति को पहचानना आसान हो जाता था. इसलिए पिता के नाम को परिवार की पहचान का आधार माना गय.

प्राचीन सभ्यताओं से शुरू हुई परंपरा

इतिहास बताता है कि यह परंपरा हजारों साल पुरानी है. रोमन साम्राज्य और मेसोपोटामिया जैसी प्राचीन सभ्यताओं में भी पितृसत्तात्मक नामकरण प्रणाली मौजूद थी. इन समाजों में नागरिकता, संपत्ति और पारिवारिक पहचान पिता के वंश से ही तय होती थी.धीरे-धीरे यह प्रणाली दुनिया के कई हिस्सों में फैल गई.

औपनिवेशिक दौर में और मजबूत हुई व्यवस्था

हालांकि पिता के उपनाम पहले भी इस्तेमाल होते थे, लेकिन 18वीं सदी के बाद ब्रिटेन और यूरोप में इसे अधिक औपचारिक रूप दिया गया. ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में भी आधिकारिक रिकॉर्ड और दस्तावेजों में स्थायी उपनाम की व्यवस्था शुरू हुई। इसी समय बच्चों को पिता का उपनाम देने की परंपरा और मजबूत हो गई.

कुछ समाजों में मां के नाम की परंपरा

दुनिया में कुछ समाज ऐसे भी हैं जहां मातृसत्तात्मक व्यवस्था है. भारत में केरल का नायर समुदाय और मेघालय की खासी व गारो जनजाति में बच्चों की पहचान मां के नाम से जुड़ी होती है. इन समुदायों में संपत्ति और वंश भी मां की ओर से ही आगे बढ़ता है.

भारत में वर्तमान कानूनी स्थिति

आधुनिक भारतीय कानून के अनुसार बच्चे के लिए पिता का नाम रखना अनिवार्य नहीं है. कई अदालतों ने स्पष्ट किया है कि आधिकारिक दस्तावेजों में केवल मां का नाम भी इस्तेमाल किया जा सकता है. खासकर सिंगल मदर को अपने बच्चे का पंजीकरण, स्कूल में दाखिला और जन्म प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेजों में खुद को एकमात्र अभिभावक के रूप में दर्ज कराने का पूरा अधिकार है.

बच्चों को पिता का नाम देने की परंपरा ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों से विकसित हुई थी. लेकिन आधुनिक समाज में पहचान के नए विकल्प सामने आ रहे हैं. आज कानून भी यह मानता है कि बच्चे की पहचान सिर्फ पिता के नाम से ही तय होना जरूरी नहीं है.

 

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