करवा चौथ पर आस्था, प्रेम और समर्पण का संगम, बाजारों में उमड़ी सुहागिनों की भीड़

शाहगंज, जौनपुर :  भारतीय संस्कृति में करवा चौथ केवल एक व्रत नहीं, बल्कि पति-पत्नी के अटूट प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के साथ मनाए जाने वाले इस पर्व की पूर्व संध्या पर बुधवार को शाहगंज के बाजारों में सुहागिन महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी। व्रत की तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए महिलाएं सुबह से ही खरीदारी में जुटी रहीं। गुप्ता गली, घास मंडी और कोतवाली रोड सहित प्रमुख बाजारों में पूजन सामग्री, करवा, छलनी, दीपक, चूड़ियां, बिंदी, साड़ी और शृंगार के सामान की दुकानों पर चहल-पहल दिखाई दी। त्योहार की रंगत से बाजार गुलजार रहे और दुकानदार भी ग्राहकों की आवाजाही से उत्साहित नजर आए।

वीरावती की कथा से जुड़ी है धार्मिक मान्यता

करवा चौथ की प्रचलित व्रत कथाओं में वीरावती की कथा विशेष रूप से सुनाई जाती है। मान्यता के अनुसार, वीरावती सात भाइयों की इकलौती बहन थी। विवाह के बाद पहली करवा चौथ पर वह मायके में रहकर निर्जला व्रत रखती है। शाम तक भूख-प्यास से उसकी हालत बिगड़ने लगती है। बहन की परेशानी देखकर उसके भाई पेड़ के पीछे दीपक जलाकर उसे चंद्रमा निकलने का आभास कराते हैं। वीरावती उसे वास्तविक चंद्रमा समझकर व्रत खोल लेती है। कथा के अनुसार, इसके बाद उसे पति के अनिष्ट का समाचार मिलता है। दुखी वीरावती को व्रत की मर्यादा और विधि-विधान का बोध होता है। वह पूरी श्रद्धा से व्रत करती है और उसकी निष्ठा से प्रसन्न होकर देवी की कृपा से उसके पति को जीवनदान मिलता है। इस लोकप्रचलित कथा का संदेश है कि व्रत में श्रद्धा, संयम और विधि-विधान का विशेष महत्व है।

सूर्योदय से चंद्रोदय तक व्रत, फिर पूजा-अर्चना

परंपरा के अनुसार, करवा चौथ के दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करती हैं और इसके बाद निर्जला व्रत का संकल्प लेती हैं। दिनभर अन्न और जल का त्याग कर शाम को भगवान गणेश, भगवान शिव, माता पार्वती और करवा माता की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान महिलाएं करवा चौथ की कथा सुनती हैं, पूजा की थाली सजाती हैं और पति की मंगलकामना करती हैं। चंद्रमा निकलने पर छलनी से चंद्र दर्शन करने, करवे से अर्घ्य देने और पति के दर्शन के बाद उनके हाथों जल ग्रहण कर व्रत खोलने की परंपरा है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा की विधि में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है। यह पर्व दांपत्य जीवन में परस्पर विश्वास, प्रेम और पारिवारिक एकता की भावना को मजबूत करने का अवसर माना जाता है।

रामचरितमानस के आदर्शों में भी दिखती है प्रेम और समर्पण की भावना

गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम और माता सीता का जीवन प्रेम, मर्यादा, विश्वास और त्याग का आदर्श प्रस्तुत करता है। 

अयोध्याकांड की चौपाई 

“जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी॥”

 में माता सीता के श्रीराम के प्रति अनुराग और साथ निभाने की भावना व्यक्त होती है। करवा चौथ के अवसर पर इस आदर्श दांपत्य का स्मरण पर्व के भावनात्मक पक्ष को और गहरा करता है। शाहगंज के बाजारों में खरीदारी करती महिलाओं के चेहरों पर भी अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम और परिवार की सुख-शांति की कामना झलकती रही। पूजन सामग्री से लेकर शृंगार के सामान तक की खरीदारी के बीच बाजारों में पारंपरिक उल्लास का माहौल बना रहा।

चित्र परिचय-

1. शाहगंज के बाजार में करवा चौथ की पूर्व संध्या पर पूजन सामग्री और शृंगार के सामान की खरीदारी करतीं महिलाएं।


धार्मिक संदर्भ: वीरावती की कथा करवा चौथ की प्रचलित लोक-परंपरा का हिस्सा है। पर्व की शुरुआत कब और किस ऐतिहासिक घटना से हुई, इसका एक सर्वमान्य प्रमाणित विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए समाचार में कथा को धार्मिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। I

रिपोर्टर : दीपक  सिंह

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