संवत्सरी प्रतिक्रमण सम्पन्न होने के बाद झकनावदा श्रीसंघ ने इंदौर पहुंचकर गच्छाधिपति से पूछी सुखसाता, की क्षमायाचना

झकनावदा (निप्र)। जैन समाज के सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पर्व पर्युषण महापर्व के अंतिम दिवस संवत्सरी पर झकनावदा नगर में धर्माराधना एवं क्षमायाचना का वातावरण रहा।समाजजनों ने विधि-विधानपूर्वक संवत्सरी प्रतिक्रमण कर वर्षभर में जाने-अनजाने में हुई भूलों के लिए एक-दूसरे से क्षमायाचना की और “मिच्छामि दुक्कडम्” कहकर मन के वैर-भाव को समाप्त करने का संकल्प लिया। संवत्सरी पर्व के समापन के पश्चात श्री केसरियानाथ जिनालय में समाजजनों द्वारा भक्तिभाव के साथ महाआरती का आयोजन किया गया। महाआरती के विभिन्न चढ़ावे समाजजनों ने उत्साहपूर्वक लिए तथा लाभार्थियों द्वारा भगवान की महाआरती उतारी गई। इस दौरान जिनालय परिसर में भक्ति एवं धार्मिक उल्लास का वातावरण बना रहा।

इंदौर पहुंचकर गच्छाधिपति से पूछी सुखसाता

संवत्सरी पर्व सम्पन्न होने के अगले दिन बुधवार सुबह झकनावदा श्रीसंघ के प्रतिनिधिमंडल ने इंदौर पहुंचकर चातुर्मास में विराजमान पुण्य सम्राट के पट्टधर गच्छाधिपति श्री नित्यसेन सूरीजी महाराज साहेब आदि ठाणा के दर्शन-वंदन किए। श्रीसंघ के शैतानमल कुमट, अखिल भारतीय श्री राजेंद्र जैन नवयुवक परिषद के प्रांतीय सह मीडिया प्रभारी मनीष कुमट, राजेंद्र कुमार सेठिया, हर्ष मांडोत, तेजस कुमट के साथ साथ धार जिले के राजगढ़ श्रीसंघ के प्रतिनिधि मंडल के प्रमुखों आदि ने महाराज साहेब के दर्शन कर सुखसाता पूछी तथा मिच्छामि दुक्कडम् करते हुए क्षमायाचना की। इस अवसर पर श्रीसंघ के सदस्यों ने पर्युषण महापर्व के दौरान हुई धार्मिक आराधना एवं संवत्सरी पर्व के आयोजन की जानकारी भी गुरुदेव के समक्ष रखी।

गुरुदेव ने दिया क्षमापना पर्व का संदेश

इस अवसर पर गच्छाधिपति श्री नित्यसेन सूरीजी महाराज साहेब ने समाजजनों को संबोधित करते हुए कहा कि संवत्सरी केवल एक-दूसरे से औपचारिक रूप से क्षमा मांगने का दिन नहीं, बल्कि अपने अंतर्मन को देखने और आत्मचिंतन करने का अवसर है। मनुष्य को अपनी भूलों को स्वीकार कर उन्हें दोहराने से बचने का संकल्प लेना चाहिए।
उन्होंने कहा कि क्षमा मांगने के साथ-साथ दूसरों को क्षमा करना भी उतना ही आवश्यक है। यदि मन में किसी व्यक्ति के प्रति राग, द्वेष अथवा वैर का भाव बना हुआ है तो क्षमापना की भावना पूर्ण नहीं हो सकती। जैन धर्म हमें सभी जीवों के प्रति मैत्री, करुणा और अहिंसा का भाव रखने की प्रेरणा देता है। गुरुदेव ने समाजजनों को संदेश देते हुए कहा कि “मिच्छामि दुक्कडम्” की भावना को केवल संवत्सरी तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। परिवार, समाज और व्यवसाय में आपसी प्रेम, सद्भाव और विश्वास बनाए रखते हुए सभी के प्रति क्षमाशील दृष्टिकोण रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि पर्युषण पर्व की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब पर्व के दौरान किए गए आत्मचिंतन, तप, त्याग, स्वाध्याय और क्षमापना की भावना हमारे व्यवहार में भी दिखाई दे। मन की कड़वाहट दूर कर प्रेम एवं मैत्री का भाव विकसित करना ही इस पावन पर्व का मूल संदेश है। गुरुदेव के मंगल संदेश को सुनकर झकनावदा श्रीसंघ के सदस्यों ने आशीर्वाद प्राप्त किया तथा धर्म, संयम और क्षमाभाव को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया। इस दौरान इंदौर में चातुर्मास में विराजमान दिगंबर जैनाचार्य श्री सुधा सागर जी के भी संघ ने दर्शन वंदन कर सुखसाता पूछकर मिच्छामि दुक्कडम कर क्षमायाचना की।

संवाददाता - मनीष झाबुआ 

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