नवरात्रे में अष्टमी तिथि को द्याहड़ी आठै और ऊत

झालावाड़ : नवरात्रे में अष्टमी तिथि को पूरा परिवार द्हयाडी (द्याहड़ी) आठै की पूजा करता है, ढोक लगाते हैं। इसमें दीवार पर सिन्दूर से देवी का त्रिशूल बनाकर अपने अपने कुल की वंश परम्परा के अनुसार ही पूजा करते हैं, भोजन भी वही बनता है, जो वंश परम्परा से बनते आया है। जैसे हमारे खीर और बाटी बनती हैं, सब्जी नहीं बनती और तवा नहीं चढता। इस तरह सबके अपने अपने कुल के अनुसार पूजा विधि और घरेलु विधान है। द्याहड़ी के रूप में सभी ने किसी न किसी वनस्पति को गोद ले रखा है, जैसे किसी के नीम, किसी के आशा पाला, किसी के दूधी आदि आदि । हमारे दूधी की द्याहड़ी मंडोवरा व्यासों के हैं, लेकिन कौंडिन्य (कुराडिया) वंश में आशापाला की द्याहड़ी होती है। यह वनस्पति उस कुल द्वारा संरक्षित होती है। जिस कुल की द्याहड़ी जो वृक्ष हैं, उसे क्षति पहुंचाने का अर्थ कुल का नाश होना माना जाता है। जब घर में नव वधु आती हैं, तो उसे इन सबको देखना और मानना होता है, तभी वो घर बसा पाती है, अपने पितृपक्ष की सत्ती द्याहड़ी के क्रिया कलापों की जगह अपने ससुराल के रीति रिवाज और परम्पराओं को सीखना और मानना होता है, इसका सीधा अर्थ है कि ससुराल के वातावरण में ढल जाना हैं। वहाँ के वातावरण के विरुद्ध जाना कलह को जन्म देता है। हमारे घर त्रिशूल से घी का रैला चलाया जाता है, जिसमें धार टूटनी नहीं चाहिए, धार टूटने का अर्थ है कि वंश परम्परा खंडित हो सकती है। दूधी की द्याहड़ी होने के कारण कुलाम्बा दुग्धासना हमारी कुल देवी हैं। द्याहड़ी आठै पर घर का कोई भी सदस्य कहीं भी बाहर हो, तो भी उसे हर हाल में आठै की पूजा में सम्मिलित होना जरूरी होता है। यानी यह जरूरी शर्त वर्ष में एक बार सबको एक साथ एकत्रित होने, मिलने और वंश परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए कटिबद्ध करती है। 
              दूसरा अवसर " पाटा भरना, रातिजगा) होता है, पाटा ऊत जी का भरा जाता है। ऊत वंश का कोई व्यक्ति (जो कुंवारा ही अकाल मृत्यु को प्राप्त) व्यक्ति होता है। लोक आस्था में ऊत को सर्प योनी में माना जाता है। घर के व्यक्ति जब किसी संकट से बार बार आहत होते हैं, तब ऊत जी का पाटा भराकर रातिजगा किया जाता है। ऊत जी के पाटे की भी शर्त यही है कि उसमें भी एक भी सदस्य नहीं चूकना चाहिए, चाहे अलग रह रहे हो, या मन मुटाव हों, सबको सम्मिलित होना होता है, रातभर ऊत जी और शंकर भगवान के भजन होते हैं । परिवार के किसी व्यक्ति के भाव रूप में ऊत आते हैं और परिवारिक समस्याओं का समाधान करते हैं, ऐसी लोक आस्था है। लेकिन यह बात बिल्कुल सत्य है कि कुवांरे रहने तक जो जुडाव घर से होता है, वो शादी होने के बाद अलग हुए भाईयों के परिवार से नहीं रहता है, तब ऊत जी परिवारों को जोडते है। हमारी परम्परा में यह सब संयुक्त परिवार की अवधारणा को समेटे हुए है। पारम्परिक जुडाव और वंश परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए कुल दीपक की आवश्यकता होती है, इसलिए पुत्र की कामना की जाती है, दूसरों के कुल की वृद्धि हेतु पुत्री की कामना की जाती हैं, क्योंकि पुत्री का असली घर ससुराल होता है, उसे यह अधिकार हमारी सामाजिक व्यवस्था ने दिया है, नारीवादी भले स्त्री के बडे हिमायती बनते हों, भ्रम फैलाते हो, पुत्र और पुत्री में भेद भाव बताकर सामने रखते हों, पर असल में पुत्र ही अपने वंश को आगे बढाता है, पुत्री अपने पति के वंश को आगे बढ़ाती है। पुत्र पुत्री सदैव समान रहे हैं, जन्म पर थाली बजाना और बन्दूक, पटाखे आदि चलाना मात्र सूचना देना है कि अमुक घर में पुत्र हुआ है, या पुत्री हुई है। द्वैषी और नारीवाद से ग्रसित व्यक्ति कुछ भी अर्थ लगाकर कुछ भी भ्रान्ति पैदा कर सकता है। "पौळ कुवांरी रहने " के पीछे भी पुत्र पुत्री को सम्मान देते हुए लोक व्यवहार हेतु भोजन की व्यवस्था रखी गई हैं। अपनी खुशियों में गांव पडौस को शामिल करना रहा है। हमारी संस्कृति जीओ और जीनों दो, के साथ प्रकृति के संरक्षण, संयुक्त और संगठित रहकर खुशहाल जीवन यापन का संदेश देती है, जिसमें कानूनी नियमों की जकडन की जगह नैतिक नियमों की अनुपालना का भाव संरक्षित होता है। जय हो सनातन परम्परा की।

रिपोर्टर : रमेश चन्द्र शर्मा 

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