संतुलित उर्वरक प्रबंधन पर टीईईबी एग्रीफूड प्रोजेक्ट के तहत सत्र हुआ आयोजित

झांसी : उप निदेशक कृषि कार्यालय स्थित उप संभागीय सभागार में संतुलित उर्वरक और स्वस्थ मिट्टी विषय पर मिट्टी की सेहत, पोषक तत्व प्रबंधन और उर्वरकों के संतुलित उपयोग के प्रभाव पर सार्थक संवादात्मक सत्र आयोजित  हुआ।भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान (आईआईएफएसआर), मोदीपुरम और भारतीय चारागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान (आईजीएफआरआई), झांसी ने संयुक्त रूप से प्रतिभाग किया। यह सत्र "टू वैल्यू अकाउंटिंगः मेकिंग द इकोनॉमिक केस फॉर ट्रांसफॉर्मेशन इन इंडिया" (टीईईबी एग्रीफूड) प्रोजेक्ट के अंतर्गत आयोजित किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य किसानों और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के साथ संतुलित उर्वरक प्रबंधन पर चर्चा करना था, ताकि कृषि पद्धतियों को सतत और आर्थिक रूप से लाभकारी बनाया जा सके। जिससे किसानों की आय को दुगुना किया जा सके। संवादात्मक सत्र उप निदेशक कृषि कार्यालय के उप संभागीय सभागार में आयोजित हुआ। इसमें लगभग 28 किसान उत्पादक संगठनों और 22 किसानों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। ये किसान मोंठ, बंगरा, सिमरधा, परवे, बरुआसागर, चिरगांव, रोनिजा, बबीना, बड़ागांव और गरौठा जैसे विभिन्न दूर-दराज के गांवों से आए थे। भारतीय चारागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान झांसी के  वैज्ञानिकों ने किसानों को प्रोजेक्ट के उद्देश्यों के बारे में सूक्ष्म से सूक्ष्मतम जानकारी दी और उन्होंने बताया कि संतुलित उर्वरक के उपयोग से मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर होता है, खेती की लागत कम होती है और वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन के माध्यम से फसल उत्पादन में वृद्धि होती है।

आयोजित संवादात्मक सत्र में महेंद्र पाल सिंह, उप निदेशक कृषि ने कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करते हुए उन्होंने किसानों से इस प्रोजेक्ट में सक्रिय रूप से जुड़ने का आग्रह किया और टिकाऊ खेती के तरीकों को अपनाने के महत्व पर जोर दिया। आयोजित एक दिवसीय सत्र में डॉ0 एस0आर0 कांतवा और डॉ0  निवासन रामकृष्णन, प्रधान वैज्ञानिक, फसल उत्पादन विभाग, आईजीएफआरआई, झांसी ने पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से  प्रोजेक्ट की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने जानकारी दी कि टीईईबी एग्रीफूड प्रोजेक्ट के तहत कुल 300 किसानों को जोड़ा जाएगा। इस परियोजना में पारंपरिक खेती, जैविक खेती और एग्रोफॉरेस्ट्री प्रणालियों के बीच तुलनात्मक अध्ययन किया जाएगा। जिसका किसानों को सीधा लाभ प्राप्त होगा।
आयोजित सत्र में बताया गया कि वैज्ञानिक "मल्ट्रीपल कैपिटल अप्रोच" (प्राकृतिक, उत्पादित, सामाजिक और मानव पूंजी) का उपयोग कर इन प्रणालियों का विश्लेषण करेंगे। इस अध्ययन में मिट्टी की गुणवत्ता, पर्यावरणीय स्थिति, जल संसाधन, मानव कल्याण और सामाजिक पहलुओं का समग्र मूल्यांकन शामिल होगा, जिससे कृषि के वास्तविक मूल्य को समझने और भारत में विशेषकर बुंदेलखंड क्षेत्र में टिकाऊ कृषि परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करने में मदद मिलेगी। कार्यक्रम में अपर जिला कृषि अधिकारी पवन मीणा द्वारा आगामी खरीफ की फसलों के लिए रासायनिक उर्वरकों की मात्रा को कम कर बर्मी,नैफिट बर्मी का प्रयोग करने पर बल दिया। इसी क्रम में डॉ0 मानसी द्वारा पीईसवी कल्चर का बीज शोधन में प्रयोग करने की विधि को प्रदर्शित कर दिखाया गया।
उप संभागीय सभागार में आयोजित एक दिवसीय संवादात्मक सत्र में प्राकृतिक और जैविक के विषय में श्रीमती अल्पना बाजपेयी परियोजना प्रभारी द्वारा भी बिंदुवार जानकारी दी गई। इसी क्रम में तकनीकी सहायक लल्ला सिंह द्वारा खरीफ की फसलों से पूर्व खेत में हरी खाद के लिए ढैंचा की फसल को बोने की सलाह दी।
कार्यक्रम का सफल संचालन विषय वस्तु विशेषज्ञ दीपक कुशवाहा द्वारा किया गया।
आयोजित सत्र में बड़ी संख्या में किसान और किसान उत्पादक संगठन प्रगतिशील कृषक उपस्थित रहे।

 

रिपोर्टर : अंकित साहू

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