मेजर ध्यानचंद का आंगन: जहाँ आज भी जीवित है हॉकी का स्वर्णिम इतिहास
झांसी - वह शाम रोज जैसी ही थी, लेकिन हवाओं में कुछ खास लिखा था। जैसे ही मैंने मेजर ध्यानचंद स्पोर्ट्स स्टेडियम के पोर्च पर कदम रखा,नए प्रभारी क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी कर्मवीर पटेल जी ने मुस्कुराते हुए टोक दिया— "बिल्लू भाई, अशोक ध्यानचंद जी के घर नहीं चलना है? कल ही तो फोन पर बात हुई थी,उनकी बात सुनते ही मेरी यादों की धुंध छंट गई।
हाँ सर,बिल्कुल चलना है। मैंने उत्साह से जवाब दिया। तैयारी शुरू हुई। कर्मवीर सर ने फौरन एक बुके मंगवाया। कुछ ही देर में कर्मवीर सर और उपक्रीड़ा अधिकारी सुनील कुमार एक मोटरसाइकिल पर और मैं अपनी बाइक पर उस पते की ओर निकल पड़े, जो किसी तीर्थ स्थान से कम नहीं था। वो जादुई पल जैसे ही हमने 'हॉकी के जादूगर' के घर के सामने अपनी गाड़ियां खड़ी कीं, सामने साक्षात अशोक ध्यानचंद सर खड़े थे। विश्व विजेता टीम के सदस्य और मेजर साहब के सुपुत्र का व्यक्तित्व इतना सरल कि उन्होंने देखते ही हम सबको गले लगा लिया। वह औपचारिक मुलाकात पल भर में आत्मीयता में बदल गई।
खेलो के मंदिर में प्रवेश
अशोक सर हमें उस कमरे में ले गए जिसे हम 'खेलों का मंदिर' कह सकते हैं। वहां कदम रखते ही एक अलग ऊर्जा का अहसास हुआ। चारों ओर मेजर ध्यानचंद साहब की स्मृतियां और वो ऐतिहासिक ओलंपिक पदक सजे थे, जिन्होंने भारत का नाम पूरी दुनिया में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा था।अशोक सर एक-एक पदक और तस्वीर के पीछे की कहानी सुना रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो इतिहास हमारी आंखों के सामने दोबारा जी उठा हो। चाय-बिस्कुट के नाश्ते के बीच खेलों के उस दौर की बातें हुईं, जिन्हें सुनकर रोंगटे खड़े हो रहे थे। यादों को हमने तस्वीरों में कैद किया और भारी मन से विदा ली।झांसी आना साकार हुआ-वापस स्टेडियम लौटते समय कर्मवीर सर और सुनील कुमार जी की आंखों में एक अलग ही चमक थी। उनके मुंह से अचानक निकला— "बिल्लू भाई, आज झांसी आना वाकई साकार हो गया। बचपन से जिस 'हॉकी के जादूगर' की गाथाएं किताबों और किस्सों में सुनी थीं, आज उनके घर जाकर उनकी स्मृतियों को छू लेना... मन आनंदित हो गया।"वह शाम केवल एक मुलाकात नहीं थी, बल्कि एक महान विरासत के प्रति सम्मान और श्रद्धा की यात्रा थी।


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