एतिहासिक महत्व और वीरांगना की अस्मिता को दरकिनार कर,व्यक्तिगत लाभ को दी तबज्जों,पार्षदों के खिलाफ सीएम को लिखा पत्र
झांसी : कर्मयोगी संस्था द्वारा सीएम योगी आदित्यनाथ को लिखे पत्र में बताया कि विश्व की पहली सिंहासन पर विराजमान प्रतिमा स्थापित किए जाने हेतु शासन प्रशासन द्वारा निर्धारित समस्त प्रक्रियाओं का पालन करते हुए शासन से अनुमति प्राप्त कर झांसी महानगरी में उसके ही नाम से महारानी लक्ष्मीबाई पार्क में अपने खर्चे पर सिंहासन पर विराजमान प्रतिमा स्थापित किए जाने के एक माह से अधिक समय बाद वहां पर सिर्फ सौंदर्यीकरण किया जाना शेष था, इसी दौरान हठधर्मिता पर उतारू क्षेत्रीय पार्षद सहित अन्य कुछ पार्षदों ने मानों शासन - प्रशासन की अनुमति को ही चुनौती देते हुए सौंदर्यीकरण के काम को रूकवा दिया। उल्लेखनीय है कि पूर्व में कर्मयोगी संस्था द्वारा क्षेत्रीय पार्षद लखन कुशवाहा से संपर्क किए जाने पर उन्होंने स्पष्ट कहा था कि यदि यही प्रतिमा नगर निगम से करीब एक करोड़ रुपए बजट पास करवाए जाने के बाद स्थापित कराई जाती तो उन्हें 10 प्रतिशत कमीशन मिलता, लेकिन संस्था द्वारा अपने खर्चे पर प्रतिमा स्थापित किए जाने पर उन्हें क्या लाभ।
इसके बाद संस्था द्वारा व्यक्तिगत रूप से अनेकों पार्षदों से संपर्क सहमति (छाया प्रति संलग्न) के साथ ही सांसद अनुराग शर्मा, सदर विधायक रवि शर्मा ,शिक्षक विधायक बाबूलाल तिवारी के सहमति पत्रों के साथ ही पूर्व नगर आयुक्त , वर्तमान नगर आयुक्त , महापौर बिहारी लाल आर्य की संस्तुति पर शासन द्वारा निर्धारित दस बिन्दुओं पर जिलाधिकारी झांसी व वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की संयुक्त आख्या सहित प्रेषित किए जाने पर प्रदेश के संस्कृति विभाग द्वारा कर्मयोगी संस्था को अनुमति प्रदान की गयी थी।
जयपुर से आई महारानी की प्रतिमा को अपनी ही नगरी में नहीं मिला प्रवेश
शासन से अनुमति के बाद सभी संबंधित उच्चाधिकारियों को अवगत कराये जाने के बाद संस्था द्वारा कार्य प्रारंभ करने हेतु जयपुर में निर्मित प्रतिमा को ससम्मान झांसी लाया गया, लेकिन यहां पर भी दबंगई दिखाते हुए क्षेत्रीय पार्षद ने पार्क के सभी दरवाजे बंद करवा दिए और करीब दस घंटे बाद मौके पर पहुंचे महापौर बिहारी लाल आर्य, तत्कालीन अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व , नगर मजिस्ट्रेट ,अपर नगर आयुक्त आदि की मौजूदगी में प्रतिमा को पार्क में प्रवेश कराया जा सका,जहां एक बार फिर क्षेत्रीय पार्षद व दो अन्य पार्षदों ने पूर्व निर्धारित स्थल पर महारानी की प्रतिमा को स्थापित करने का विरोध करते हुए पार्क में ही उक्त स्थल से कुछ दूर स्थापित करने का दबाव बनाया । महापौर व उपस्थित अधिकारियों के कहे अनुसार संस्था द्वारा निर्माण कार्य शुरू किया गया था और पार्षद द्वारा बदलवाए गये स्थान पर महारानी की सिंहासन पर विराजमान प्रतिमा स्थापित किए जाने के एक माह बाद उक्त पार्षद ने पुनः विरोध जताते हुए नगर निगम में महिला अधिकारी/नगर आयुक्त से भी कैसे अमर्यादित व्यवहार कर संस्तुति पर जबाब मांगा ।
लेकिन सत्ता की हनक में वीरांगना की महानगरी में उनकी विश्व की पहली सिंहासन पर विराजमान प्रतिमा को स्थापित स्थल से हटाकर कहीं और स्थापित करने का दबाव बनाते हुए मौके पर सौंदर्यीकरण का काम रूकवा दिया गया है। संस्था द्वारा अपने खर्चे पर स्थापित प्रतिमा तिरपाल में ढंकी हुई वैभवशाली स्वरूप में लोकार्पण किये जाने की बाट जोह रही हैं।
*भाजपा से टिकट न मिलने पर की थी बगावत
अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उक्त क्षेत्रीय पार्षद लखन कुशवाहा को विगत चुनाव में पार्टी से टिकट न दिए जाने पर उन्होंने पार्टी के निर्णय के खिलाफ बगावत कर निर्दलीय प्रत्याशी बतौर चुनाव लड़ते हुए पार्टी के निर्णय की जमकर आलोचना की थी। बाद में शासन सत्ता का सुख और लाभ अर्जित करने के लिए वह फिर भाजपा में शामिल हो गए।
नहीं दिखाई दिया जर्जर राष्ट्रीय ध्वज और वीरांगना के घोड़े पर लगा विशाल मधुमक्खी का छत्ता
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पूर्व में इन्हीं पार्षद के कार्यकाल में महारानी लक्ष्मीबाई पार्क में स्थापित विशाल राष्ट्रीय ध्वज कई दिन जर्जर हालत में फहराता रहा और तत्कालीन महापौर राम तीर्थ सिंघल को मीडिया द्वारा अवगत कराए जाने पर ध्वज को बदला गया था। इन्हीं पार्षद के इसी कार्यकाल में पार्क में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के घोड़े पर विशाल मधुमक्खी के छत्ते के संबंध में मीडिया और सोशल मीडिया के द्वारा प्रसारित खबरों की ओर भी उन्होंने ध्यान देना जरूरी नहीं समझा आखिरकार कर्मयोगी संस्था ने ही जोखिम उठाते हुए स्वयं अपने खर्चे पर श्रमदान करते हुए बमुश्किल से उक्त छत्ता हटाया गया था वरना उक्त मधुमक्खियां आने वाले सैलानियों/पार्क में घूमने आने वालों के लिए खतरा बन सकती थीं।
सहमति जताने वाले पार्षदों को भी किया जा रहा बरगलाने का कुत्सित प्रयास
अत्यंत ही कष्टदायक पहलू यह है कि जिन महारानी लक्ष्मीबाई ने "मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी " का उदघोष करते हुए झांसी की आन-बान-शान और सिंहासन की रक्षा के लिए अंग्रेजी सेना से टक्कर लेते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर संपूर्ण विश्व को अपनी वीरता, अदम्य साहस और बलिदान से अचंभित कर दिया,आज उनकी ही महानगरी में बलिदान के बाद भी सिंहासन पर विराजमान किए जाने का विरोध किया जा रहा है। उक्त क्षेत्रीय पार्षद द्वारा कुछ चुनिंदा साथियों के साथ मिलकर प्रतिमा की स्थापना के समर्थक पार्षदों को यह कहकर बरगलाने का कुत्सित और घृणित प्रयास किया जा रहा है कि बिना सदन की सहमति से प्रतिमा की स्थापना से उनके अधिकारों का हनन हो रहा है और अब वह किसी भी कीमत पर पार्क में सिंहासन पर विराजमान प्रतिमा को नहीं रहने देंगे।
पार्टी की नीतियों के विरुद्ध क्या ऐसे देशद्रोहियों का पार्टी में रहना उचित ?
अब सवाल यह उठता है कि संपूर्ण विश्व में भारतीय नारी की अस्मिता और स्वाभिमान की प्रतीक महारानी लक्ष्मीबाई की सिंहासन पर विराजमान प्रतिमा को उनकी ही महानगरी में पार्क में स्थापित किए जाने के विरोधी ऐसे देशद्रोही, लालची प्रवृत्ति के पार्षदों को भाजपा जैसी देशभक्त और ईमानदार पार्टी में रहने का अधिकार है या पार्टी की छवि को धूमिल करने वाले पार्षदों को तत्काल बाहर का रास्ता दिखाते हुए भविष्य में भी ऐसे कुत्सित और लोभी मानसिकता वालों को आगामी नगर निगम के चुनाव में टिकट से वंचित किया जाना चाहिए, जिससे भविष्य में कोई भी पार्टी का कर्मठ पदाधिकारी ऐसे कृत्य करने का साहस भी नहीं कर सके।
पत्र के माध्यम से अनुरोध किया गया कि पार्क में महारानी लक्ष्मीबाई जी की सिंहासन पर विराजमान प्रतिमा स्थापना स्थल पर सौंदर्यीकरण कार्य को पूर्ण कराए जाने हेतु आदेशित किये जाने के साथ ही हठधर्मिता पर उतारू, प्रतिमा स्थापित किए जाने का विरोध करने वाले पार्षदों की सूची नगर निगम झांसी से तलब कर उन्हें तत्काल पार्टी से निष्कासित कर भविष्य में भी टिकट न दिए जाने की कृपा करें। जिससे पार्टी की छवि को धूमिल करते हुए ऐसा कुत्सित प्रयास करने की कोई पुर्नावृति न कर सके और कर्मयोगी संस्था इस पुनीत कार्य को पूर्ण करते हुए झांसी की महारानी को उनके सिंहासन पर सुशोभित कर सके।आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि भविष्य में भी संस्था के पुनीत कार्यो में आपका सानिध्य प्राप्त होता रहेगा।
आमजन मानस के कुछ ज्वलंत सवाल - स्थानीय जनप्रतिनिधियों में सांसद, विधायक, महापौर, नगर आयुक्त,विभिन्न विभागों की व जनपद के उच्चाधिकारियों संस्तुति पर शासन द्वारा मांगी गई दस बिन्दुओं पर जिलाधिकारी व एसएसपी की संयुक्त आख्या प्रेषित किए जाने पर शासन द्वारा विश्व की पहली सिंहासन पर विराजमान महारानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा स्थापना की अनुमति के बाद ही स्थापित प्रतिमा को पार्क से हटाए जाने की मांग कहां तक न्यायोचित है। क्या कुछ पार्षदों के द्वारा विरोध प्रदर्शन कर सौन्दर्यीकरण का रोका जाना स्थानीय जनप्रतिनिधियों, शासन - प्रशासन को सीधी चुनौती देने के समान नहीं है। वीर भूमि पर विश्व की पहली सिंहासन पर विराजमान प्रतिमा का विरोध करना भाजपा जैसी अनुशासित पार्टी की नीतियों के अनुरूप है? यदि नहीं तो फिर शासन- प्रशासन को सीधी चुनौती देकर पार्टी की छवि को धूमिल करने वाले लालची प्रवृत्ति के कुत्सित मानसिकता वालों को पार्टी में रहने का अधिकार है? इस ऐतिहासिक मुद्दे को विरोधी दलों द्वारा आगामी विधानसभा चुनाव में उठाए जाने पर पार्टी को नुक़सान होगा या लाभ
आमजन मानस के ऐसे ही कुछ ज्वलंत सवाल लाजिमी है, जिनका जवाब सिर्फ और सिर्फ भाजपा शीर्ष नेतृत्व पर ही निर्भर है ।
रिपोर्टर : अंकित साहू
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