जीवन को जयवंत बनाने के लिए पुरुषार्थ के मार्ग पर चलें: विशाश्री माताजी

झांसी :  अतिशय क्षेत्र करगुवांजी स्थित विद्यासागर सभागार में पर्युषण पर्व"के नौवें दिन उत्तम आकिंचन्य    धर्म पर मंगल देशना देते हुए गणिनी आर्यिका 105 विशाश्री माताजी ने कहा कि आकिंचन्य धर्म का मतलब किसी से मोह नहीं रखना है अर्थात त्याग का भी त्याग करना है। मन, वचन और काया से भी त्याग को विस्मृत करना आंकिचन्य धर्म है। उन्होंने कहा कि दुनिया  में प्रत्येक जीव अकेला आया है और अकेला ही जाना है यह यथार्थ सत्य है, जो भी यहां एकत्रित किया है उसे त्याग कर ही जाना पड़ेगा।किंचित मात्र ही मेरा यहां कुछ नहीं है। वे कहती हैं कि जीवन को जयवंत बनाने के लिए पुरुषार्थ के मार्ग पर चलें। यदि अंतरंग में परिग्रह की एक कणिका भी शेष रह गयी तो आत्मा सिद्धस्थ को प्राप्त नहीं कर सकती है। इससे पूर्व भक्तामर महा मण्डल आराधना विधान के तिरपनवें दिन गुरुवार के पुण्यार्जक प्रदीप कुमार जैन ,श्रीमती आशा जैन, कैप्टन अक्षत कुमार जैन, श्रीमती आकांक्षा सागर जैन, (कल्याण) श्रीमती अदिति पिंकेश जैन बैंगलोर एवं समस्त परिवार  सालासर सिटी करगुवां जी रहे, जिन्होंने शांतिधारा  का सौभाग्य प्राप्त किया, माताजी को शास्त्र भेंटकर पाद प्रक्षालन किया एवं पं.कमलेश जैन‌ शास्त्री छतरपुर  के मार्गदर्शन में समस्त धार्मिक क्रियायें सम्पन्न कराते हुए अर्घ समर्पित किये। प्रारंभ में पुण्यार्जक परिजनों ने आचार्य श्री विराग सागर एवं  विशुद्ध सागर जी के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलित करने का सौभाग्य प्राप्त किया।संचालन   एड.शिरोमणि जैन ने किया।अंत में संजय सिंघई ने सभी का आभार व्यक्त किया। इस मौके पर पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य,डा.मुकेश‌ नजा, डा.अभिषेक जैन, प्रकाशचंद्र जैन,विनोद जैन ठेकेदार, अशोक जैन जैनिथ, भागचंद जैन सहित बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालु मौजूद‌ रहे।

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