"सोमनाथ से बुंदेलखंड तक आस्था, इतिहास और पुनर्जागरण का दिव्य संगम" 30 को

झाँसी। आर्ट ऑफ लिविंग परिवार एवं स्वर्ग आश्रम समिति बरुआसागर के संयुक्त तत्वावधान में गुरुदेव  रवि शंकर के स्नेह एवं आशीर्वाद से 30 मार्च को शाम 4:00 बजे से ब्रह्मलीन स्वामी श्री शरणानंद सरस्वती की पावन तपो स्थली स्वर्ग आश्रम, बरुआसागर में भगवान सोमनाथ महादेव से जुड़ा एक अत्यंत पावन, ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक आयोजन संपन्न होने जा रहा है। यह केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की आस्था, संघर्ष, बलिदान और पुनर्जागरण की जीवंत गाथा का पुनर्प्रकाश है।
सर्किट हाउस में कार्यक्रम के संबंध में जानकारी देते हुए आर्ट ऑफ लिविंग की जोनल कोऑर्डिनेटर श्रीमती कंचन आहूजा, स्वर्ग आश्रम समिति के उपाध्यक्ष राहुल रिछारिया के साथ आर्ट ऑफ लिविंग परिवार एवं स्वर्ग आश्रम समिति के सदस्य डॉ. संजय त्रिपाठी व श्रीमती रुचि अरोरा ने बताया कि इतिहास साक्षी है कि वर्ष 1025-1026 ई. में महमूद गज़नबी ने लगभग 1000 मील दूर से विशाल सेना के साथ सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। उस समय हजारों ब्राह्मण एवं लगभग 50,000 श्रद्धालु पूजा-अर्चना में लीन थे। इस पावन वातावरण को भंग करते हुए भीषण जनसंहार हुआ और अपार धन-संपदा की लूट की गई। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि सोमनाथ मंदिर पर अनेक बार आक्रमण हुए लगभग 17 बार मंदिर को तोड़ा गया, किंतु हर बार भारत की जनता, राजाओं और श्रद्धालुओं ने उसे पुनः स्थापित किया।
उन्होंने कहा कि आस्था को कभी पराजित नहीं किया जा सकता।इस संघर्ष में वीरता की भी अमर गाथाएँ जुड़ी हैं। विशेष रूप से युवा राजपूत योद्धा वीर हमीर जी गोहिल ने अल्पायु में ही सोमनाथ की रक्षा हेतु अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी स्मृति आज भी हमें यह प्रेरणा देती है कि धर्म और आस्था की रक्षा सर्वोच्च कर्तव्य है।" लगातार आक्रमणों के पश्चात महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया तथा गर्भगृह को सुरक्षित स्वरूप प्रदान किया, जिससे इसकी पवित्रता अक्षुण्ण बनी रहे।
स्वतंत्र भारत में, उस समय की सरकार के मार्गदर्शन में सरदार वल्लभभाई पटेल के संकल्प से 12 नवम्बर 1947 को सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। 1949 में सोमनाथ ट्रस्ट का गठन हुआ और 11 मई 1951 को प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा हजारों संतों की उपस्थिति में मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई। यह स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान का पुनर्जागरण था।
श्री रिछारिया ने कहा कि पौराणिक मान्यता के अनुसार, दक्ष प्रजापति के श्राप से पीड़ित चंद्रदेव ने सोमनाथ तट पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की, जिसके फलस्वरूप भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया और यहाँ प्रथम ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई। समय के साथ मंदिर का स्वरूप भी बदलता रहा सतयुग में स्वर्ण, त्रेतायुग में रजत एवं द्वापर में चंदन से निर्मित होने की मान्यता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी सोमनाथ का विशेष महत्व है। समुद्र तट पर स्थित मंदिर का स्तंभ यह संकेत देता है कि यहाँ से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में कोई भूभाग नहीं है जो हमारे प्राचीन ज्ञान की उत्कृष्टता को दर्शाता है।हाल के वर्षों में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गांधीनगर से जुड़े अध्ययन में यह संकेत प्राप्त हुए कि मंदिर के नीचे विभिन्न गहराइयों (लगभग 2.5 मीटर, 5 मीटर एवं 7.5 मीटर) पर संरचनात्मक स्तर विद्यमान हैं, जो इसकी बहु-स्तरीय एवं प्राचीन विरासत को दर्शाते हैं।
आध्यात्मिक परंपरा के अनुसार, गज़नबी के आक्रमण के पश्चात कुछ अग्निहोत्री ब्राह्मणों ने शिवलिंग के पावन अंशों को सुरक्षित रखा और पीढ़ियों तक उनकी गुप्त रूप से पूजा की। कथनानुसार वर्ष 1924 में कांची पीठ के शंकराचार्य ने निर्देश दिया कि इन पावन अवशेषों की रक्षा कर उन्हें 100 वर्ष पश्चात बेंगलुरु स्थित एक संत को सौंपा जाए। इसी परंपरा के अनुसार 2024-2025 में ये पावन अंश गुरुदेव रवि शंकर को समर्पित किए गए, जो आज इस दिव्य परंपरा को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं।
बुंदेलखंड के लिए ऐतिहासिक क्षण बताते हुए कहा कि अब वही दिव्यता, वही परंपरा, वही आशीर्वाद
बुंदेलखंड की पावन धरती, झाँसी में साकार होने जा रहा है।यह अत्यंत गौरव और सौभाग्य का विषय है कि हजारों वर्षों तक संघर्ष और विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के पश्चात स्वयं सोमनाथ महादेव इस क्षेत्र को आशीर्वाद देने आ रहे हैं।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह करते हुए कहा कि अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर रुद्र पूजा एवं दर्शन का लाभ अर्जित करें और भगवान सोमनाथ महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करें यह अवसर जीवन में बार-बार नहीं आता।

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