अबोध बच्चे को बहला-फुसलाकर अप्राकृतिक कुकर्म के आरोपी का अग्रिम जमानत प्रार्थनापत्र निरस्त

झांसी। अबोध बच्चे को बहला-फुसलाकर अप्राकृतिक कुकर्म के मामले में आरोपी का अग्रिम जमानत प्रार्थनापत्र अपर सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट)मोहम्मद नेयाज अहमद अंसारी के न्यायालय ने निरस्त कर दिया।
विशेष लोक अभियोजक विजय सिंह कुशवाहा के अनुसार सूचनाकर्ता ने न्यायालय में धारा-156(3) दं.प्र.सं. के तहत इस आशय का प्रार्थना पत्र दिया था कि उसके मुहल्ले में ही रहने वाले धर्मप्रकाश व्यास (धर्म) उम्र करीब 48 वर्ष ने उसके करीब 8 वर्षीय  अबोध बालक को बहला-फुसलाकर पूर्व में भी अप्राकृतिक कुकर्म किया। किसी को बताने पर डरा-धमकाकर जान से मारने की धमकी देता था और पतंग, मंजा, टॉफी, चॉकलेट आदि का लालच देकर धमकाकर 25 जुलाई 2024 को दिन में समय करीब 1-2 बजे के आसपास बच्चे को अपने घर ले गया और उसके साथ अप्राकृतिक कुकर्म किया। ज्यादा समय बीतने पर भी बच्चे के घर नहीं लौटने के कारण वादी ने परिजनों, रिश्तेदारों व मुहल्ले वालों के साथ मिलकर तलाश किया तो बच्चा नग्न अवस्था में धर्मप्रकाश के घर मिला। भीड़ एकत्रित होते देख धर्मप्रकाश मौके से भाग गया। वादी ने लोक-लाज व मुहल्ले की घटना की वजह से तुरन्त कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की। अभियुक्त व उसके भाइयों का नगर व मुहल्ले में काफी आतंक व भय व्याप्त है, इस वजह से उसने सामाजिक तौर पर बच्चे की मानसिक स्थिति व घबराहट के कारण तुरन्त कोई कार्यवाही नहीं की थी, परन्तु धीरे-धीरे समयो- परान्त बच्चे द्वारा माँ को बताने पर जानकारी हुई की ऐसी घटना पूर्व में भी बच्चे के साथ की जा चुकी है, तो दोषी को सजा दिलाने व किए गए घृणित कृत्य की रिपोर्ट दर्ज कराने थाने गया।थाने के बाद,वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक व अन्य उच्चाधिकारियों से शिकायत के बाद भी रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई। अभियुक्त द्वारा प्रस्तुत अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायालय ने माना कि इस न्यायालय में आत्म समर्पण किए जाने हेतु एक माह की समायवधि प्रदान की गई थी, जो विगत 26 जून को समाप्त हो गई है। अभियुक्त द्वारा न केवल  उच्चतम न्यायालय के आदेश की अवहेलना की है, बल्कि वास्तविक तथ्यों को छिपाकर यह अग्रिम जमानत प्रार्थनापत्र इस न्यायालय में दाखिल करने के बजाए सत्र न्यायाधीश, झाँसी के न्यायालय में दाखिल किया गया, जिससे कि न्यायालय को गुमराह कर आदेश प्राप्त किया जा सके। इस प्रकार अभियुक्त एवं उसके अधिवक्ता फरीद अहमद (शरीफ) द्वारा आपसी मिली भगत से उच्चतम न्यायालय के द्वारा पारित उपरोक्त आदेश से बचने के लिए न केवल  उच्चतम न्यायालय के आदेश को इस न्यायालय एवं सत्र न्यायाधीश के न्यायालय से छुपाया गया, बल्कि पॉक्सो न्यायालय के बजाए सत्र न्यायाधीश के न्यायालय में इस आशय से दाखिल किया गया जिससे कि उच्चतम न्यायालय का आदेश सत्र न्यायाधीश के न्यायालय के संज्ञान में न आ सके और इसका अनुचित लाभ लिया जा सके, जो स्वस्थ्य व्यवसायिक परंपरा एवं दुर्भावनापूर्ण आशय से की गई कार्यवाही है, जो एक व्यवसायिक कदाचार है।इन कारणों से अभियुक्त की अग्रिम जमानत याचिका को स्वीकार किए जाने का पर्याप्त आधार नहीं पाते हुए न्यायालय ने अभियुक्त धर्मप्रकाश उर्फ धर्मू का प्रार्थना पत्र निरस्त कर दिया।

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