त्याग करने वाले ही सिद्धस्थ को प्राप्त होते हैं: विशाश्री माताजी
झांसी। अतिशय क्षेत्र करगुवांजी स्थित विद्यासागर सभागार में पर्युषण पर्व"के आठवें दिन उत्तम त्याग पर्व पर मंगल देशना देते हुए गणिनी आर्यिका 105 विशाश्री माताजी ने कहा कि पहले दान फिर पूजा श्रावक का उत्तम धर्म यही है। जो दान ,पूजा नहीं करता वह सच्चा श्रावक नहीं है। उन्होंने कहा कि एक त्याग किया जाता है दूसरा दान दिया जाता है जो अर्जन से विसर्जन की ओर ले जाता है। वे कहती हैं कि गुप्त दान की सिद्धि श्रेष्ठ फल की प्राप्ति कराती है।जो त्याग की ओर बढ़ते रहते हैं वही सिद्धस्थ को प्राप्त होते हैं। प्रकृति भी त्याग के सिद्धांत पर निर्भर है। सूरज चांद रोशनी का त्याग कर धरा से अंधेरा दूर करते हैं तो वृक्ष फल और नदियां जल का त्याग कर जीवों को जीवन देती हैं, लेकिन समुद्र पानी का त्याग नहीं करता तो वह खारा बन गया है परिणाम स्वरूप उसका पानी पीने योग्य भी नहीं है।इससे पूर्व भक्तामर महा मण्डल आराधना विधान के बावनवें दिन बुधवार के पुण्यार्जक एडवोकेट शिरोमणि जैन ,श्रीमती प्रीति जैन, पीहू जैन, कुहू जैन, विजय जैन पीएनबी, श्रीमती इंद्रा जैन वीरांगना नगर,वीरेंद्र जैन नेडा, श्रीमती ऊषा जैन, चंद्रकुमार जैन, श्रीमती बबली (चाची) एवं समस्त परिवार रहे, जिन्होंने शांतिधारा का सौभाग्य प्राप्त किया, माताजी को शास्त्र भेंटकर पाद प्रक्षालन किया एवं पं.कमलेश जैन शास्त्री छतरपुर के मार्गदर्शन में समस्त धार्मिक क्रियायें सम्पन्न कराते हुए अर्घ समर्पित किये। प्रारंभ में पुण्यार्जक परिजनों ने आचार्य श्री विराग सागर एवं विशुद्ध सागर जी के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलित करने का सौभाग्य प्राप्त किया।संचालन चातुर्मास समिति के एड.शिरोमणि जैन ने किया।अंत में सिंघई संजय कुमार जैन ने सभी का आभार व्यक्त किया। इस मौके पर पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य, यूथप जैन पिंकी, कमल जैन लोकपथ, इंजीनियर बालचंद्र जैन, हीरालाल जैन,विनोद जैन ठेकेदार, सुनील मोदी, विकास जैन, अशोक जैन जैनिथ, भागचंद जैन,कल्पना जैन,रचना जैन, रानी जैन सहित बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालु मौजूद रहे।
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