केजरीवाल के बाद अब हेमंत सोरेन का 'शीश महल' विवादों में
झारखंड की सियासत में इन दिनों सिर्फ एक ही चर्चा है, और वो है 'मुख्यमंत्री का नया आशियाना'! जी हां एक तरफ राज्य की गरीब जनता पक्के मकान के लिए तरस रही है, युवाओं की छात्रवृत्ति और नौकरियों पर फंड की कमी का रोना रोया जा रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों में एक आलीशान 'शीश महल' की नींव रखी जा रही है। दिल्ली के सीएम रहे अरविंद केजरीवाल के दिल्ली स्थित कथित “शीशमहल” विवाद के बाद जिस तरह राजनीतिक माहौल बदला था, उसी तरह की तुलना अब झारखंड में होने लगी है और रांची में प्रस्तावित नए मुख्यमंत्री आवास को लेकर सियासत तेज हो गई है। रांची के कांके रोड पर बनने जा रहे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नए आवास को लेकर आर-पार की जंग छिड़ गई है। बीजेपी का दावा है कि यह देश का दूसरा सबसे महंगा सीएम आवास होगा, जिसकी लागत 100 करोड़ के पार जाएगी। क्या यह एक प्रशासनिक जरूरत है या फिर झारखंड जैसे राज्य की तिजोरी पर फिजूलखर्ची का बोझ? आइए जानते हैं झारखंड के इस शीश महल के पीछे का पूरा विवाद!
दरअसल, झारखंड सरकार ने 25 मार्च को मुख्यमंत्री के नए आलीशान बंगले के लिए ई-निविदा जारी की है। दस्तावेजों के अनुसार, इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 68.91 करोड़ रुपये बताई गई है। लेकिन असली खेल आंकड़ों के पीछे छिपा है। आपको बता दें...
47.80 करोड़ की लागत से बनेगा मुख्य ढांचा।
1.99 करोड़ सिर्फ पानी के फव्वारों पर खर्च होंगे।
2.63 करोड़ प्रकृति की हरियाली सजाने के लिए।
लिफ्ट के लिए ₹58 लाख, फायर-फाइटिंग के लिए ₹1.08 करोड़ और एसी सिस्टम के लिए ₹1.30 करोड़ का प्रावधान है।
वहीं इस शीश महल को लेकर झारखंड बीजेपी के दिग्गज नेता बाबूलाल मरांडी और प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू ने मोर्चा खोल दिया है। बीजेपी का कहना है कि 69 करोड़ तो सिर्फ कागजी आंकड़ा है; जब इसमें आलीशान इंटीरियर, विदेशी फर्नीचर और साज-सज्जा जुड़ेगी, तो यह आंकड़ा आसानी से 100 करोड़ रुपये को पार कर जाएगा। मरांडी ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जब राज्य के आदिवासियों और युवाओं के विकास की बात आती है, तो सरकार 'खाली खजाना' दिखाती है, लेकिन खुद के ऐशो-आराम के लिए रातों-रात टेंडर जारी हो जाते हैं।
हालांकि सत्ताधारी झारखंड मुक्ति मोर्चा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। प्रवक्ता मनोज पांडे और सुप्रियो भट्टाचार्य का कहना है कि यह हेमंत सोरेन का व्यक्तिगत घर नहीं, बल्कि 'मुख्यमंत्री कार्यालय' का हिस्सा है। रांची का पुराना आवास ब्रिटिश काल का है और सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतरता। JMM ने बीजेपी को आईना दिखाते हुए कहा कि दिल्ली में बन रहा 'सेंट्रल विस्टा' क्या फिजूलखर्ची नहीं है? पार्टी का तर्क है कि आने वाले समय में जो भी मुख्यमंत्री बनेगा, वह इसी सुरक्षित और आधुनिक बुनियादी ढांचे का उपयोग करेगा। आपको बता दें नई दिल्ली में राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक के 3.2 किमी लंबे क्षेत्र को सेंट्रल विस्टा कहते हैं। इस वक्त सेंट्रल विस्टा के अंदर राष्ट्रपति भवन, संसद, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, रेल भवन, वायु भवन, कृषि भवन, उद्योग भवन, उपराष्ट्रपति का घर, आदि हाउस आते हैं। सेंट्रल विस्टा का ही हिस्सा नई संसद भवन का निर्माण पूरा होने के बाद इसका उद्घाटन 28 मई 2023 को प्रधानमंत्री मोदी ने किया था।
वहीं हेमंत सोरेन के बन रहे शीश महल को लेकर बीजेपी प्रवक्ता प्रतुल शाह देव ने दावा किया कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री आवास के बाद यह देश का दूसरा सबसे महंगा सरकारी बंगला बनने जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस राज्य में 'अबूआ आवास' योजना के तहत बेघरों को मकान देने के लिए पैसे नहीं हैं, वहां मुख्यमंत्री के लिए 'शीश महल' क्यों बन रहा है? दरअसल, 12 मई 2025 में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पत्नी कल्पना सोरेन के साथ भूमि पूजन कर इसकी आधारशिला रखी थी। जहां 29 अप्रैल 2026 में निविदा जमा करने की अंतिम तिथि है। जिसके बाद 30 अप्रैल 2026 में बिड खोली जाएगी और निर्माण कार्य को गति दी जाएगी।
देखा जाए तो सवाल यह नहीं है कि मुख्यमंत्री का घर आधुनिक होना चाहिए या नहीं। सवाल 'प्राथमिकता' का है। क्या झारखंड जैसे राज्य में, जहां कुपोषण, बेरोजगारी और बेघरी आज भी बड़े मुद्दे हैं, वहां करोड़ों के फव्वारे और आलीशान बगीचे जरूरी हैं? विपक्ष इसे चुनावी मुद्दा बना रहा है और सरकार इसे विकास का प्रतीक बता रही है। लेकिन अंत में, पैसा तो झारखंड की उसी जनता का है जो आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है। अब देखना यह होगा कि 29 अप्रैल को जब टेंडर की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, तो यह 'शीश महल' विवाद और कितनी आग पकड़ेगा।


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