दिल्ली में छात्रों की आवाज...रांची में विपक्ष खामोश क्यों?
झारखंड में छात्र सड़कों पर हैं...बारिश हो या धूप...भूख हड़ताल हो या पुलिस की बैरिकेडिंग...छात्र अपनी मांगों को लेकर डटे हुए हैं। रांची में विधानसभा मार्च के दौरान लाठीचार्ज हुआ...आंसू गैस के गोले छोड़े गए...पानी की बौछार की गई...यहां तक कि छात्रों को रोकने के लिए कंटीले तार तक लगाए गए। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक सवाल ऐसा है, जो अब झारखंड की सड़कों से निकलकर सीधे विपक्ष के दरवाजे तक पहुंच गया है। जी हां जब दिल्ली में छात्र प्रदर्शन करते हैं तो विपक्ष उनकी आवाज बन जाता है...जब प्रयागराज में छात्र सवाल उठाते हैं तो राहुल गांधी उनके बीच पहुंच जाते हैं...जब कोटा में युवा परेशान होते हैं तो विपक्ष सरकार को घेरता है...लेकिन जब यही छात्र झारखंड में अपने हक के लिए सड़क पर उतरते हैं...तो विपक्ष की आवाज अचानक धीमी क्यों पड़ जाती है? कहीं इसलिए तो नहीं, क्योंकि झारखंड में सरकार भाजपा की नहीं...बल्कि इंडिया गठबंधन की है? ऐसे में सवाल है कि क्या छात्रों का दर्द भी अब सरकार देखकर तय होगा? क्या पेपर लीक का दर्द दिल्ली में अलग और रांची में अलग हो जाता है? क्या लाठीचार्ज की चोट सत्ता के हिसाब से बदल जाती है? आज की इस खास रिपोर्ट में सवाल सिर्फ झारखंड सरकार से नहीं...बल्कि उस विपक्ष से भी है, जो दिल्ली में छात्रों का मसीहा और रांची में खामोश क्यों नजर आया। देखिए हमारी ये खास रिपोर्ट...
विपक्ष का वह चेहरा, जो कुछ दिन पहले तक छात्रों के साथ खड़े होने का दावा कर रहा था। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों का प्रदर्शन हुआ तो विपक्ष के बड़े-बड़े नेता सामने आए। राहुल गांधी ने छात्रों के मुद्दे पर सरकार को घेरा। प्रियंका गांधी छात्रों के समर्थन में दिखाई दीं। अखिलेश यादव ने भी सरकार पर निशाना साधा। और डिंपल यादव खुद प्रदर्शन स्थल पर पहुंचकर छात्रों के बीच खड़ी दिखाई दीं। तब सवाल था कि छात्रों की आवाज कौन उठाएगा? तो विपक्ष ने कहा....हम उठाएंगे। लेकिन अब वही सवाल झारखंड में पूछा जा रहा है। रांची में छात्र सड़क पर थे...तो विपक्ष कहां था? क्या रांची के छात्र दिल्ली के छात्रों से अलग हैं? क्या पेपर लीक का दर्द सिर्फ उस वक्त दिखाई देता है, जब सत्ता में बीजेपी हो? और अगर छात्र पर लाठी चलती है तो क्या लाठी की चोट भी राजनीतिक पार्टी देखकर तय की जाती है? क्योंकि झारखंड में सरकार हेमंत सोरेन की है...
और हेमंत सोरेन इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं। तो क्या यही वजह है कि विपक्ष की आवाज रांची में धीमी पड़ गई? यही सवाल अब कांग्रेस समेत पूरे इंडिया गठबंधन से पूछा जा रहा है। और अब...करीब 12 दिन बाद राहुल गांधी कहते हैं कि हर सरकार को छात्रों की बात सुननी चाहिए। सवाल है कि यह बात पहले क्यों नहीं कही गई? क्या छात्रों की आवाज सुनने के लिए आंदोलन को 12 दिन तक सड़क पर संघर्ष करना जरूरी था? राहुल गांधी ने कहा कि देश का एजुकेशन सिस्टम खराब हो चुका है और हर सरकार को छात्रों की बात सुननी चाहिए। बात सुनने में अच्छी है...लेकिन सवाल टाइमिंग पर है। अगर हर सरकार को छात्रों की बात सुननी चाहिए...तो झारखंड सरकार से यह बात पहले क्यों नहीं कही गई? अगर छात्र सही थे...तो हेमंत सोरेन सरकार पर पहले ही दबाव क्यों नहीं बनाया गया? क्यों नहीं कहा गया...मुख्यमंत्री जी, छात्रों से बात कीजिए।
क्यों नहीं कहा गया कि छात्र बारिश में बैठकर आंदोलन कर रहे हैं...भूख हड़ताल कर रहे हैं...उनकी मांगों पर तुरंत बातचीत होनी चाहिए? और सबसे बड़ा सवाल...जब केंद्र सरकार पर सवाल उठाते हुए विपक्ष इस्तीफे की मांग तक कर सकता है, तो अपनी गठबंधन सरकार के सामने इतनी नरमी क्यों? धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष एकजुट नजर आया। लेकिन झारखंड के मामले में सुर बदल गया। अब कहा जा रहा है कि सभी सरकारों को मिलकर शिक्षा व्यवस्था सुधारनी चाहिए। तो सवाल सीधा है...जब भाजपा सरकार से जवाब मांगना था, तब 'इस्तीफा'...और जब गठबंधन की सरकार से जवाब मांगना है, तब 'मिलकर काम करेंगे'?
और आपको बता दें कि ये बात सिर्फ राहुल गांधी तक सीमित नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी झारखंड के छात्रों से बात की और कहा कि जहां भी छात्रों की समस्या है, वहां वह आवाज उठाएंगे। तो सवाल फिर वही है कि क्या झारखंड सरकार को भी पत्र लिखा गया? अगर लिखा गया है तो क्या उसमें छात्रों की मांगों पर तत्काल कार्रवाई की मांग की गई? क्या हेमंत सोरेन से पूछा गया कि छात्रों पर पुलिस कार्रवाई क्यों हुई? क्योंकि विपक्ष का काम सिर्फ कैमरे के सामने बयान देना नहीं होता...विपक्ष का काम सत्ता में बैठे अपने सहयोगी से भी सवाल पूछना होता है। और अगर विपक्ष हर जगह छात्रों की आवाज बनने का दावा करता है तो फिर झारखंड में भी वही आवाज उतनी ही तेज सुनाई देनी चाहिए।
लेकिन आपको बता दें असली तस्वीर इससे भी बड़ी है। जी हां झारखंड की भर्ती परीक्षाओं को लेकर विवाद कोई आज का नहीं है। राज्य बनने के बाद अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में भर्ती परीक्षाओं को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं।
बीजेपी सत्ता में रही...JMM सत्ता में रही...कांग्रेस सरकार का हिस्सा रही...आरजेडी भी सत्ता में रही...यानी यह समस्या किसी एक पार्टी के कार्यकाल तक सीमित नहीं रही। लेकिन सवाल यह है कि 20 साल बाद भी छात्र उसी सवाल के साथ सड़क पर क्यों हैं? और सबसे जरूरी...जिस युवा ने अपनी जिंदगी के कई साल सरकारी नौकरी की तैयारी में लगा दिए, उसके भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा? JPSC और JSSC से जुड़ी परीक्षाओं पर बार-बार सवाल उठे हैं। कई मामलों में जांच हुई है और कुछ मामलों में जांच अब भी चलने की बात सामने आती रही है। यानी तस्वीर साफ है...समस्या पुरानी है। सरकारें बदलती रहीं...पार्टियां बदलती रहीं...लेकिन छात्रों की परेशानी खत्म नहीं हुई।
जाहिर है झारखंड के छात्र आज भी सड़क पर हैं। सरकार और छात्रों के बीच बातचीत का रास्ता खुलना चाहिए...मांगों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए...और अगर कहीं गड़बड़ी के आरोप हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लेकिन विपक्ष के लिए भी यह वक्त आत्ममंथन का है। क्योंकि राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि सरकार आपकी है या विरोधी की। सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि न्याय किसके साथ है। अगर दिल्ली में छात्रों पर कार्रवाई गलत है तो रांची में भी गलत है। अगर दिल्ली में पेपर लीक युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ है तो झारखंड में भी वही है। अगर दिल्ली के छात्र समर्थन के हकदार हैं तो रांची के छात्र भी उसी समर्थन के हकदार हैं। और अगर विपक्ष सच में युवाओं की आवाज बनना चाहता है...तो उसे यह साबित करना होगा कि उसकी आवाज सिर्फ वहां नहीं उठती जहां सत्ता विरोधी हो। क्योंकि छात्र वोट बैंक नहीं हैं...वे इस देश का भविष्य हैं। अब देखना होगा कि सरकार छात्रों की मांगों पर क्या फैसला लेती है...और उससे भी ज्यादा...क्या विपक्ष अपनी गठबंधन सरकार से भी वही सवाल पूछेगा, जो वह भाजपा सरकार से पूछता आया है?
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