"जिसे पाया नहीं जाता, उसे खोया नहीं जाता"- आलम खुर्शीद

हमेशा दिल में रहता है, कभी गोया नहीं जाता,
जिसे पाया नहीं जाता, उसे खोया नहीं जाता।
कुछ ऐसे ज़ख्म हैं जिनको सभी शादाब रखते हैं,
कुछ ऐसे दाग़ हैं जिनको कभी धोया नहीं जाता।।

बिहार के आरा में जन्मे आलम खुर्शीद ग़ज़ल, कविताओं और समीक्षाओं के एक शानदार रचयिता हैं। उनकी लेखनी से निकले हुए एक-एक अलफ़ाज़ दिल को छूने वाले होते हैं। आलम खुर्शीद की रचनाओं में एक तरफ जहाँ दिल को छूने वाली बातें हैं, वहीं दूसरी तरफ दिल की बातों, दुनिया की कँटीली राहों के तीखे अनुभवों को भी उन्होंने बड़े सलीके से कागज़ के सीने पर उतारा है। उनके प्रमुख ग़ज़ल संग्रहों "नए मौसम की तलाश", "ज़हरे गुल", "एक दरिया ख्वाब" और "कारे जियाँ" आदि शामिल हैं। आज आलम खुर्शीद की लेखनी से निकली कुछ ग़ज़लों को आप सभी के सामने पेश कर रहे हैं।


अपने घर में ख़ुद ही आग लगा लेते हैं,
पागल हैं हम अपनी नींद उड़ा लेते हैं।

जीवन अमृत कब हमको अच्छा लगता है,
ज़हर हमें अच्छा लगता है, खा लेते हैं।

क़त्ल किया करते हैं कितनी चालाकी से,
हम ख़ंजर पर नाम अपना लिखवा लेते हैं।

रास नहीं आता है हमको उजला दामन,
रुसवाई के गुल-बूटे बनवा लेते हैं।

पंछी हैं लेकिन उड़ने से डर लगता है,
अक्सर अपने बाल ओ पर कटवा लेते हैं।

सत्ता की लालच ने धरती बाँटी लेकिन,
अपने सीने पर तमगा लटका लेते हैं।

याद नहीं है मुझको भी अब दीन का रस्ता,
नाम मुहम्मद का लेकिन अपना लेते हैं।

औरों को मुजरिम ठहरा कर अब हम आलम,
अपने गुनाहों से छुटकारा पा लेते हैं।।

एक अजब सी दुनिया देखा करता था,
दिन में भी मैं सपना देखा करता था।

एक ख्यालाबाद था मेरे दिल में भी,
खुद को मैं शहजादा देखा करता था।

सब्ज़ परी का उड़नखटोला हर लम्हे,
अपनी जानिब आता देखा करता था।

उड़ जाता था रूप बदलकर चिड़ियों के,
जंगल, सेहरा, दरिया देखा करता था।

हीरे जैसा लगता था इक-इक कंकर,
हर मिट्टी में सोना देखा करता था।

कोई नहीं था प्यासा रेगिस्तानो में,
हर सेहरा में दरिया देखा करता था।

हर जानिब हरियाली थी, ख़ुशहाली थी,
हर चेहरे को हँसता देखा करता था।
 
बचपन के दिन कितने अच्छे होते हैं,
सब कुछ ही मैं अच्छा देखा करता था।

आँख खुली तो सारे मंज़र ग़ायब हैं,
बंद आँखों से क्या-क्या देखा करता था।।

वहीं अब आलम ख़ुर्शीद की एक और ग़ज़ल पेशे ख़िदमत है...। 

कोई मौक़ा नहीं मिलता हमें अब मुस्कुराने का,
बला का शौक़ था हम को कभी हँसने-हँसाने का।
 
हमें भी टीस की लज्ज़त पसंद आने लगी है क्या,
ख़याल आता नहीं ज़ख्मों प अब मरहम लगाने का।
 
मेरी दीवानगी क्यों मुन्तज़िर है रुत बदलने की,
कोई मौसम भी होता है जुनूँ को आज़माने का।
 
उन्हें मालूम है फिर लौट आएंगे असीर उनके,
खुला रहता है दरवाज़ा हमेशा क़ैदखाने का।
 
चटानों को मिली है छूट रस्ता रोक लेने की,
मेरी लहरों को हक़ हासिल नहीं है सर उठाने का।
 
अकड़ती जा रही हैं रोज़ गर्दन की रगें आलम,
हमें ए काश! आ जाए हुनर भी सर झुकाने का।।

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