अखिलेश के ड्रीम प्रोजेक्ट पर योगी का बड़ा दांव, 35 साल की लीज पर जाएगा JPNIC

लखनऊ में एक लाल रंग की इमारत...करीब 9 साल से बंद...करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी अपने पूरे इस्तेमाल का इंतजार करती एक ऐसी इमारत, जो उत्तर प्रदेश की सियासत में किसी आम बिल्डिंग से कहीं ज्यादा बड़ा मुद्दा बन चुकी है। जी हां नाम है जय प्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर यानी JPNIC। ये वही JPNIC है, जिसे समाजवादी पार्टी की सरकार में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट के तौर पर तैयार किया गया था। लेकिन सरकार बदली तो इस इमारत की किस्मत भी बदल गई। निर्माण पर सवाल उठे, वित्तीय गड़बड़ी के आरोप लगे, जांच बैठी और देखते ही देखते करोड़ों की ये इमारत राजनीतिक टकराव का सबसे बड़ा प्रतीक बन गई। लेकिन अब करीब 9 साल बाद JPNIC को लेकर योगी सरकार ने ऐसा फैसला लिया है, जिसने उत्तर प्रदेश की राजनीति को फिर गर्म कर दिया है। जी हां योगी कैबिनेट ने JPNIC के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी निजी कंपनी को देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। वहीं ये फैसला आते ही सपा मुखिया अखिलेश यादव का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए पूछ लिया- "भाजपा सरकार है या दुकानदार?" आइए, इस पूरी खबर को खंगालते हैं कि आखिर 864 करोड़ की ये विश्वस्तरीय इमारत कैसे लखनऊ के सबसे बड़े सियासी घमासान का अखाड़ा बन गई!

दरअसल, ओपन बिड के जरिए वृंदावन बॉटलर्स प्राइवेट लिमिटेड और रॉकवुड होटल्स एंड रिजॉर्ट्स के कंसोर्टियम का चयन किया गया है। जानकारी के मुताबिक शुरुआती लीज अवधि 30 साल बताई गई है, जबकि संचालन संबंधी अनुबंध को आगे बढ़ाने का प्रावधान भी है। कुछ रिपोर्टों में 35 वर्ष की कुल लीज अवधि का उल्लेख किया गया है। लेकिन आपको बता दें कहानी सिर्फ लीज की नहीं है। कहानी है अखिलेश यादव बनाम योगी आदित्यनाथ की सियासी विरासत की। कहानी है जेपी की विरासत बनाम राजनीतिक नैरेटिव की। और कहानी है उस इमारत की, जहां हर साल लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती पर राजनीति गर्म होती रही...जहां अखिलेश यादव को कई बार रोका गया... जहां बैरिकेडिंग हुई...गेट बंद किए गए... और एक वक्त ऐसा भी आया जब अखिलेश यादव टीन की चादरों के ऊपर से कूदकर अंदर पहुंचे और जयप्रकाश नारायण की मूर्ति पर माल्यार्पण किया। अब उसी JPNIC की चाबी सीधे सरकार के पास रहने के बजाय निजी संचालन के हाथों में जाने वाली है। ऐसे में सवाल है कि जिस JPNIC को अखिलेश यादव अपनी सरकार की विकास सोच का प्रतीक बताते रहे, क्या अब वही JPNIC योगी सरकार के लिए पिछली सरकार की नाकामी का उदाहरण है? और क्या निजी हाथों में जाने के बाद इस विवादित इमारत के दिन सच में बहुरेंगे?

वहीं इस इमारत की बात करें तो, करीब 20 एकड़ में फैले इस पूरे परिसर को बहुउद्देश्यीय अंतरराष्ट्रीय स्तर के केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई थी। इसमें कन्वेंशन सेंटर, होटल, ऑडिटोरियम, खेल सुविधाएं, स्विमिंग पूल, पार्किंग, म्यूजियम और दूसरी आधुनिक सुविधाएं शामिल हैं। परियोजना में 107 कमरों वाले होटल समेत कई सुविधाओं का प्रावधान है। इस प्रोजेक्ट की शुरुआत साल 2013 में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते हुई थी। उस वक्त इसे दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर की तर्ज पर लखनऊ में एक बड़े अंतरराष्ट्रीय स्तर के कन्वेंशन और सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर विकसित करने की कल्पना की गई थी। शुरुआत में परियोजना की लागत करीब 265 करोड़ रुपये के आसपास बताई गई थी। लेकिन समय के साथ इसका बजट कई गुना बढ़ गया और परियोजना पर सरकार की ओर से करीब 821 करोड़ रुपये खर्च होने की बात सामने आई है। यहीं से विवाद ने जोर पकड़ा और 2017 में उत्तर प्रदेश की सत्ता बदली और बीजेपी की सरकार बनी। योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। इसके बाद JPNIC के निर्माण में कथित वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर जांच शुरू हुई। सरकार की तरफ से आरोप लगाया गया कि परियोजना की लागत में भारी बढ़ोतरी हुई और कई काम तय मानकों और लागत को लेकर सवालों के घेरे में रहे। वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी लगातार कहती रही कि सरकार ने राजनीतिक बदले की भावना से अखिलेश यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट को रोक दिया। सपा का तर्क रहा कि अगर किसी निर्माण में भ्रष्टाचार हुआ है तो जांच होनी चाहिए, दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन एक तैयार हो चुकी विश्वस्तरीय इमारत को वर्षों तक बंद रखना किसी भी तरह सही नहीं है।

वहीं अखिलेश यादव कई बार कह चुके हैं कि सरकार चाहे तो JPNIC का नाम बदल दे, लेकिन इसे जर्जर न होने दिया जाए। यहां तक कि उन्होंने यह भी कहा था कि अगर सरकार उन्हें इसकी जिम्मेदारी दे तो समाजवादी पार्टी चंदा जुटाकर इसे चलाने के लिए तैयार है। लेकिन दूसरी तरफ बीजेपी का आरोप है कि समाजवादी पार्टी की सरकार ने जनता की गाढ़ी कमाई का इस्तेमाल करते हुए परियोजना का बजट अनावश्यक रूप से बढ़ाया और आधी-अधूरी इमारत का उद्घाटन कर राजनीतिक श्रेय लेने की कोशिश की। आपको बता दें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी JPNIC को लेकर कई बार अखिलेश सरकार पर निशाना साध चुके हैं और इस परियोजना में कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहे हैं। यानी एक तरफ अखिलेश यादव इसे अपने विजन और आधुनिक लखनऊ की तस्वीर बताते रहे...तो दूसरी तरफ बीजेपी इसे पिछली सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार के उदाहरण के तौर पर पेश करती रही। और अब इसी लंबी राजनीतिक लड़ाई के बीच योगी सरकार ने JPNIC को निजी क्षेत्र से संचालित कराने का रास्ता साफ कर दिया है। वहीं कैबिनेट के फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर अब इस विशाल परिसर का होगा क्या? सरकार के मुताबिक अब JPNIC को चलाने के लिए सरकारी खजाने से आगे और पैसा खर्च नहीं किया जाएगा। चयनित निजी कंपनी को अपने खर्च पर JPNIC के बाकी बचे काम पूरे करने होंगे। इन कामों में मुख्य रूप से इंटीरियर, इलेक्ट्रिकल सिस्टम, फायर सेफ्टी उपकरण और दूसरी अधूरी सुविधाएं शामिल हैं।

इन कामों पर करीब 200 से 250 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है और चयनित कंपनी को करीब दो साल के अंदर इन्हें पूरा कर संचालन शुरू करना होगा। इसके लिए एलडीए के पास 25 करोड़ रुपये की परफॉर्मेंस गारंटी जमा कराने का प्रावधान है। यानि सरकार का सीधा दावा है कि जिस इमारत पर पहले ही सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, उसके बाकी काम का बोझ अब सरकारी खजाने पर नहीं आएगा। संचालन शुरू होने के बाद निजी कंपनी को लखनऊ विकास प्राधिकरण यानी LDA को हर साल करीब 6 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा। इस रकम में हर साल 5 फीसदी की बढ़ोतरी होगी। 35 वर्ष के विस्तृत अनुबंध वाले मॉडल में यह वार्षिक भुगतान आगे चलकर करीब 35 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। अब आपको ये भी बता देते हैं कि JPNIC में कौन-कौन सी सुविधाएं चलेंगी?

इस परिसर में होटल, कन्वेंशन सेंटर, ऑडिटोरियम, पार्किंग, कार्यालय और स्पोर्ट्स सुविधाओं का संचालन निजी कंसोर्टियम करेगा।

वहीं जयप्रकाश नारायण के नाम पर बने म्यूजियम ब्लॉक का संचालन और रखरखाव LDA के पास रहेगा।

सरकार के मुताबिक परिसर में हेलिपैड भी रहेगा और सरकार अपनी जरूरत के हिसाब से इसका इस्तेमाल कर सकेगी।

इसके अलावा साल में करीब 50 दिन तक JPNIC परिसर में सरकारी कार्यक्रम बिना शुल्क आयोजित किए जा सकेंगे।

खेल सुविधाओं को लेकर भी सरकार ने रियायती व्यवस्था की बात कही है।

परिसर में क्लब और स्पोर्ट्स मेंबरशिप का प्रावधान होगा, लेकिन फीस और नियम मनमाने तरीके से निजी कंपनी तय नहीं करेगी। 

आपको बता दें जेपी यानी जयप्रकाश नारायण भारतीय राजनीति में समाजवादी आंदोलन और संपूर्ण क्रांति के सबसे बड़े चेहरों में गिने जाते हैं। समाजवादी राजनीति की जिस धारा से मुलायम सिंह यादव और आगे चलकर समाजवादी पार्टी निकली, अखिलेश यादव उसी राजनीतिक विरासत को अपने तरीके से आगे बढ़ाने का दावा करते रहे हैं। इसलिए JPNIC अखिलेश के लिए सिर्फ एक सरकारी इमारत नहीं रहा। यह उनके कार्यकाल की एक पहचान बन गया। और शायद यही वजह है कि इस इमारत को लेकर हर राजनीतिक टकराव ज्यादा बड़ा दिखाई देता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो भाजपा जहां इसे सपा शासनकाल के वित्तीय कुप्रबंधन और करोड़ों के भ्रष्टाचार की मिसाल बताकर पीपीपी मॉडल के जरिए शुरू करने का दावा कर रही है...वहीं अखिलेश यादव इसे अपने ड्रीम प्रोजेक्ट पर बीजेपी की राजनीतिक बदले की कार्रवाई और सरकारी संपत्तियों की नीलामी करार दे रहे हैं. इमारत अब 35 सालों के लिए प्राइवेट हाथों में जा चुकी है, लेकिन देखना दिलचस्प होगा कि लखनऊ की इस लाल इमारत पर छिड़ी यह सियासी जंग 2027 के चुनावों तक क्या मोड़ लेती है! 

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