सरकारी पैसा, अधूरी इमारत और 35 साल की लीज... JPNIC पर बड़ा विवाद

“सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...” राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियां आज फिर चर्चा में हैं... क्योंकि मामला उस शख्स के नाम पर बने एक ऐसे प्रोजेक्ट का है, जिसने कभी सत्ता के गलियारों में समाजवाद, लोकतंत्र और जनता के अधिकारों की बात को मजबूती दी थी। नाम है लोकनायक जयप्रकाश नारायण...और उन्हीं के नाम पर लखनऊ में बना जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर यानी JPNIC। जहां एक तरफ समाजवाद के झंडे गाड़े जाते हैं, तो दूसरी तरफ जनता की गाढ़ी कमाई के 850 करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिए जाते हैं! वो प्रोजेक्ट जिसका सपना मुलायम सिंह यादव ने देखा, जिसे रफ्तार अखिलेश यादव ने दी, लेकिन अंजाम? अंजाम ये कि जहां 32 करोड़ का एसी लगना था, वहां 42 करोड़ का टेंडर जारी हो गया! 200 करोड़ का प्रोजेक्ट 850 करोड़ पार कर गया और 10 साल बाद भी इमारत अधूरी खड़ी रही! अब इस पर सीएम योगी आदित्यनाथ का बुलडोजरी हमला हुआ है, उन्होंने सपा को सीधे डकैतों का गिरोह कह डाला! तो वहीं अखिलेश यादव कह रहे हैं कि सरकार ने JPNIC को बेच दिया! आखिर क्या है इस 850 करोड़ी घोटाले का पूरा सच? क्या समाजवाद के नाम पर अपनों के लिए ऐशो-आराम का शीशमहल तैयार हो रहा था? आइए खोलते हैं JPNIC की एक-एक फाइल और बताते हैं इस सियासी महासंग्राम की पूरी कहानी!

दरअसल, JPNIC की कहानी साल 2003-2007 के बीच मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल से शुरू हुई थी। 2013 में अखिलेश यादव की सरकार ने इसे जमीनी स्तर पर उतारने का फैसला किया। शुरुआती दावा था कि पूरा कॉम्प्लेक्स करीब 65 से 200 करोड़ रुपये में बनकर तैयार हो जाएगा। लेकिन देखते ही देखते बजट का दायरा बढ़ता गया। एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि तीन-तीन बार रिवाइज्ड बजट पास किया गया। नतीजा यह हुआ कि 850 करोड़ रुपये से ज्यादा पानी की तरह बहा दिए गए, लेकिन काम सिर्फ 60 फीसदी ही पूरा हो सका! यहीं से सवाल उठने शुरू हुए कि आखिर लागत इतनी क्यों बढ़ी? क्या निर्माण के दौरान जरूरत से ज्यादा बदलाव किए गए? इन सवालों को लेकर JPNIC लंबे समय से विवादों में रहा है। वहीं प्रोजेक्ट से जुड़े विवादों में एसी लगाने का मामला भी सामने आया। दावा किया गया कि एसी इंस्टॉलेशन का सरकारी एस्टीमेट करीब 32 करोड़ रुपये था, जबकि टेंडर करीब 42 करोड़ रुपये का निकाला गया। यानी दोनों रकम के बीच करीब 10 करोड़ रुपये का अंतर बताया गया। अब सवाल उठा कि एस्टीमेट और टेंडर की रकम में इतना अंतर क्यों आया? हालांकि किसी भी सरकारी प्रोजेक्ट में अलग-अलग परिस्थितियों के चलते लागत में बदलाव संभव है, लेकिन JPNIC के मामले में इसी तरह के कई खर्चों को लेकर सवाल उठते रहे। वहीं खूबसूरती बढ़ाने के नाम पर पेरिस से 1 करोड़ 69 लाख रुपये का पेड़ मंगाया गया, जो लगने से पहले ही सूख गया! गेस्ट हाउस के लिए वियतनाम से 900 रुपये प्रति वर्ग फीट वाले करोड़ों के महंगे पत्थर इम्पोर्ट किए गए। साज-सज्जा का सामान चुनने के बहाने एलडीए के अधिकारियों और इंजीनियरों ने सरकारी खर्च पर विदेशों की खूब सैर की।

आपको बता दें JPNIC को सिर्फ एक कन्वेंशन सेंटर नहीं बनाया जा रहा था, बल्कि इसमें 107 कमरों का 7-स्टार लग्जरी होटल, रूफटॉप हेलीपैड, ओलंपिक साइज स्विमिंग पूल, स्पा और वीआईपी क्लब की व्यवस्था की जा रही थी। वहीं सबसे बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब इसके संचालन के लिए एक प्राइवेट मैनेजमेंट कमेटी बनाई गई। इस कमेटी में अखिलेश यादव, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव, राजेंद्र चौधरी, गजेंद्र सिंह, अंजू नारायण, वसीफ हसन और अनुपमा प्रकाश को लाइफटाइम मेंबर बनाने की बात सामने आई। आरोप है कि जनता के पैसे से बने इस कॉम्प्लेक्स में इन लाइफटाइम मेंबर्स को होटल, जिम, स्विमिंग पूल और रेस्टोरेंट की मुफ्त सुविधाएं देने का प्लान था! वहीं अब कहानी का सबसे बड़ा सवाल यही है। अगर इस प्रोजेक्ट पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे तो फिर ये पूरा क्यों नहीं हुआ? यही सवाल आज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उठाते हैं। योगी आदित्यनाथ ने JPNIC का उदाहरण देते हुए समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला। योगी ने समाजवादी पार्टी पर सरकारी पैसे के दुरुपयोग और लूटखसोट के गंभीर आरोप लगाए। 

वहीं सालों तक अधूरा पड़े JPNIC को अब चालू करने के लिए योगी सरकार ने निजी निवेश का रास्ता चुना है। सरकार की तरफ से इसे बेचने के बजाय लंबी अवधि की लीज पर देने की बात सामने आई है। लेकिन अखिलेश यादव का आरोप है कि सरकार JPNIC जैसी सार्वजनिक संपत्ति को निजी हाथों में सौंप रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस संपत्ति पर जनता का पैसा लगा है, उससे निजी कंपनी आने वाले वर्षों में बड़ा फायदा कमा सकती है। लेकिन सरकार और लखनऊ विकास प्राधिकरण की ओर से कहा गया कि JPNIC को बेचा नहीं गया है, बल्कि उसे 35 साल की लीज पर दिया गया है। यानी मालिकाना हक सरकार या संबंधित सरकारी प्राधिकरण के पास ही रहेगा। हालांकि आपको बता दें JPNIC अकेला ऐसा मामला नहीं है जिस पर सियासत गरमाई है। यूपी में पहले भी कई प्रोजेक्ट्स विवादों के घेरे में रहे हैं। 

गोमती रिवर फ्रंट घोटाला

विदेशों से फव्वारे मंगाने और सौंदर्यीकरण के नाम पर करोड़ों के घपले का आरोप लगा, जिसकी जांच सीबीआई और ईडी कर रही है।

अवैध बालू खनन मामला

2012-2016 के बीच हमीरपुर, फतेहपुर में नियमों को ताक पर रखकर बांटे गए खनन पट्टों पर सीबीआई की एफआईआर हुई।

UPPSC भर्ती विवाद

आयोग में जातियों और भाई-भतीजावाद के आधार पर नौकरियां बांटने के गंभीर आरोप लगे, जिसमें हाईकोर्ट ने अध्यक्ष अनिल यादव की नियुक्ति रद्द कर दी थी।

कांग्रेस का कमला नेहरू ट्रस्ट विवाद

रायबरेली और सुल्तानपुर में सरकारी नजूल जमीनों को कूटरचित दस्तावेजों से फ्रीहोल्ड कराने के आरोपों पर योगी सरकार ने आवंटन रद्द किया।

तो यह है JPNIC का पूरा कच्चा-चिट्ठा! लोकनायक जयप्रकाश नारायण, जिन्होंने सादगी और जनता के पाई-पाई के हिसाब के लिए संपूर्ण क्रांति का अलख जगाया था, आज उन्हीं के नाम पर बने 850 करोड़ी शीशमहल पर घमासान मचा है। सवाल यह है कि क्या जनता के टैक्स के पैसे से लग्जरी होटल और रूफटॉप स्विमिंग पूल बनाना ही असली समाजवाद है? या फिर किसी अधूरे प्रोजेक्ट को लीज पर देकर चालू कराना सही कदम है? फिलहाल फैसला जनता के हाथ में है! 

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