यूपी की 57 हजार से ज्यादा पंचायतों में अब प्रधान ही संभालेंगे 'प्रशासक' की कुर्सी

यूपी के गांवों से लेकर लखनऊ के गलियारों तक सियासी तापमान 100 डिग्री के पार पहुंच गया है! जी हां, उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में अब सत्ता की तस्वीर और प्रधान जी की तकदीर दोनों बदलने वाली है। अमूमन देखा जाता है कि कार्यकाल खत्म होते ही नेताओं की कुर्सी छिन जाती है, लेकिन बाबा के राज में ऐसा चमत्कार हुआ है कि हजारों ग्राम प्रधान बिना चुनाव जीते, नए और दमदार अवतार में उसी कुर्सी पर दोबारा बैठने जा रहे हैं! आइए जानते हैं इस महा-फैसले की पूरी इनसाइड स्टोरी कि आखिर योगी सरकार ने चुनाव से ठीक पहले यह दांव क्यों चला है!

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पंचायत चुनाव टलने के बीच एक ऐसा ऐतिहासिक और बड़ा दांव खेला है, जिसने विपक्ष के होश उड़ा दिए हैं और गांव की चौपालों पर चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। सरकार ने मौजूदा ग्राम प्रधानों की बरसों पुरानी मांग को स्वीकार करते हुए, उन्हें एक बार फिर गांव का सुल्तान यानी प्रशासक नियुक्त करने का फैसला लिया है! दरअसल, उत्तर प्रदेश की कुल 57,695 ग्राम पंचायतों का वर्तमान 5 साल का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया है। कायदे से तो अब तक चुनाव हो जाने चाहिए थे, लेकिन कानून और आरक्षण के पेच के कारण चुनाव टल गए। ऐसे में सवाल था कि गांवों का विकास कार्य कौन संभालेगा? क्या नौकरशाही हावी होगी? लेकिन योगी सरकार ने जनहित और प्रशासनिक निरंतरता को ध्यान में रखते हुए आदेश जारी किया कि 27 मई 2026 से सभी निवर्तमान ग्राम प्रधान ही अपने-अपने गांवों में प्रशासक के रूप में कार्यभार संभालेंगे। इसके लिए प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को अधिकृत कर दिया गया है, जो औपचारिक रूप से प्रधानों को प्रशासक नामित करेंगे। यह व्यवस्था नई ग्राम पंचायतों की पहली बैठक होने तक या फिर अधिकतम 6 महीने की अवधि तक लागू रहेगी। आपको बता दें प्रधान जी की कुर्सी तो बच गई है, लेकिन योगी सरकार ने इस गुड न्यूज के साथ कुछ सख्त और कड़े नियम भी जोड़ दिए हैं ताकि कोई अपनी मनमानी न कर सके:

सिर्फ रूटीन कामकाज की इजाजत

प्रशासक बने ग्राम प्रधान केवल सामान्य और रोजमर्रा के प्रशासनिक काम ही कर सकेंगे। जैसे- गांव की साफ-सफाई, पेयजल व्यवस्था, स्ट्रीट लाइट दुरुस्त कराना, छोटी-मोटी प्रशासनिक व्यवस्था और सरकारी योजनाओं की सामान्य निगरानी।

नीतिगत फैसलों पर 'नो एंट्री'

ये प्रशासक गांव में कोई भी नया नीतिगत फैसला नहीं ले सकेंगे और न ही कोई बड़ा वित्तीय हेरफेर या नई बड़ी योजना शुरू कर पाएंगे।

विशेष परिस्थिति में डीएम ही 'बॉस'

अगर किसी गांव में कोई बेहद जरूरी या विशेष हालात पैदा होते हैं, जहां बड़ा फैसला लेना अनिवार्य हो, तो प्रधान जी सीधे डिसीजन नहीं ले पाएंगे। उन्हें इसका प्रस्ताव जिला पंचायत राज अधिकारी के जरिए जिलाधिकारी के सामने रखना होगा। डीएम साहब की हरी झंडी मिलने के बाद ही वो फैसला लागू हो सकेगा।

आपको बता दें यूपी में पंचायत चुनाव मई-जून 2026 में ही होने थे, लेकिन गाड़ी अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के पेच में आकर फंस गई। दरअसल, बिना आरक्षण तय किए पंचायत चुनाव नहीं कराए जा सकते। इसी कानूनी अनिवार्यता को पूरा करने के लिए उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने पिछले हफ्ते एक समर्पित राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया है। इस आयोग की कमान इलाहाबाद हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस राम औतार सिंह को सौंपी गई है। जस्टिस राम औतार सिंह का इस मामले में पुराना और तगड़ा अनुभव है; साल 2022-23 में जब निकाय चुनावों के दौरान ओबीसी आरक्षण का विवाद हुआ था, तब भी उन्होंने ही सर्वे करवाकर मामला सुलझाया था। वहीं जस्टिस राम औतार सिंह की अध्यक्षता वाले इस हाई-प्रोफाइल आयोग में बेहद अनुभवी चेहरे शामिल किए गए हैं:

जस्टिस राम औतार सिंह, अध्यक्ष - रिटायर्ड हाई कोर्ट जज
बृजेश कुमार, सदस्य - रिटायर्ड अपर जिला जज
संतोष कुमार विश्वकर्मा, सदस्य - रिटायर्ड अपर जिला जज
डॉ. अरविंद कुमार चौरसिया, सदस्य - रिटायर्ड आईएएस अधिकारी
एसपी सिंह, सदस्य - रिटायर्ड आईएएस अधिकारी

वहीं इस आयोग का मुख्यालय लखनऊ में बनाया गया है। यह आयोग गांव-गांव जाकर ओबीसी समुदाय की सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक भागीदारी का विस्तृत सर्वे और अध्ययन करेगा कि गांव की राजनीति में पिछड़ों को कितना प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। सरकार ने आयोग को पदभार ग्रहण करने की तारीख से अधिकतम 6 महीने का समय दिया है। यानी नवंबर 2026 तक आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी। रिपोर्ट आने के बाद आरक्षण की आपत्तियां मांगने और उनके निस्तारण में भी करीब 1 महीने का वक्त लगेगा। दरअसल, उत्तर प्रदेश के गांवों में सिर्फ ग्राम प्रधान ही नहीं, बल्कि त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था के तहत कई और पदों पर भी चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश में कुल मिलाकर:

क्षेत्र पंचायत सदस्य: 75,855 पद
क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष: 826 पद
जिला पंचायत सदस्य: 3,051 पद
जिला पंचायत अध्यक्ष: 75 पद पर चुनाव होने हैं। 

जिस तरह ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को खत्म हुआ, ठीक उसी तरह जिला पंचायतों का कार्यकाल 11 जुलाई 2026 को और क्षेत्र पंचायतों का कार्यकाल 19 जुलाई 2026 को खत्म होने जा रहा है। ऐसे में सियासी गलियारों की मानें तो यूपी में फरवरी-मार्च 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। नियमानुसार विधानसभा चुनाव के दो-तीन महीने पहले कोई दूसरा बड़ा चुनाव नहीं कराया जा सकता। चूंकि वोटर लिस्ट का फाइनल प्रकाशन ही 10 जून 2026 को होना है और आयोग की रिपोर्ट नवंबर के बाद आएगी, इसलिए अब यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि यूपी पंचायत चुनाव अब 2027 के विधानसभा चुनावों के बाद ही संपन्न हो पाएंगे! 

तो कहानी कुल मिलाकर यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। ग्राम प्रधान गांवों की राजनीति की सबसे प्रभावशाली इकाई होते हैं। उन्हें कुर्सी पर बनाए रखकर सरकार ने ग्रामीण इलाकों में प्रशासनिक शून्य को तो भरा ही है, साथ ही साथ लाखों प्रधानों और उनके समर्थकों को नाराज होने से भी बचा लिया है। जहां एक तरफ प्रधान जी इस राहत भरे फैसले से गदगद हैं कि उनका रौब और रूतबा बरकरार रहेगा, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी खेमे में इस बात को लेकर बेचैनी है कि चुनाव से ठीक पहले गांवों में मौजूदा प्रधानों को यह पावर देना कहीं बीजेपी का कोई बड़ा राजनीतिक संतुलन साधने का गेम प्लान तो नहीं है! अब देखना यह होगा कि 6 महीने तक प्रशासक के रूप में काम करने वाले ये प्रधान जी, आने वाले विधानसभा और पंचायत चुनाव में ऊंट को किस करवट बिठाते हैं! 

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