महाभियोग से पहले जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा, जले हुए नोटों ने छीन ली कुर्सी!

देश की न्यायपालिका से आज एक बड़ी खबर सामने आई। कहते हैं कि कानून के हाथ लंबे होते हैं, लेकिन जब कानून के रखवाले ही सवालों के घेरे में आ जाएं, तो लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है। जी हां जले हुए नोटों के उस रहस्यमयी कांड ने आखिरकार एक हाईप्रोफाइल न्यायिक करियर का अंत कर दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा, जो दिल्ली के अपने बंगले में मिले भारी-भरकम कैश और आग की घटना के बाद से ही विवादों के भंवर में थे, उन्होंने आखिरकार आज हार मान ली है। संसद में महाभियोग की तलवार लटकी देखी, तो जस्टिस वर्मा ने सीधे राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज दिया। 

दरअसल, इस पूरे ड्रामे की शुरुआत होती है 15 मार्च 2025 की उस रात से, जिसने दिल्ली के लुटियंस जोन में हड़कंप मचा दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट के जज के तौर पर कार्यरत जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास के स्टोररूम में अचानक आग लग गई। दमकल कर्मी जब आग बुझाने पहुंचे, तो जो मंजर दिखा उसने सबके होश उड़ा दिए। वहां रद्दी कागजों की तरह 500-500 के नोटों की गड्डियां बिखरी पड़ी थीं। कुछ जल चुकी थीं, कुछ अधजली थीं। वीडियो वायरल हुआ और देखते ही देखते यह कैश कांड देश की सबसे बड़ी सुर्खी बन गया। जस्टिस वर्मा उस वक्त भोपाल में थे, उन्होंने इसे साजिश बताया, लेकिन आग की लपटों ने उनके दामन पर भ्रष्टाचार के दाग छोड़ दिए थे।

वहीं मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने फौरन एक्शन लिया। 22 मार्च 2025 को एक आंतरिक जांच समिति बनाई गई। हाईकोर्ट के तीन जजों के पैनल ने जब फाइलें खंगालीं, तो जस्टिस वर्मा की मुश्किलें बढ़ गईं। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की और आखिर में उन्हें उनके मूल कैडर यानी इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया। 5 अप्रैल 2025 को उन्होंने इलाहाबाद में शपथ तो ली, लेकिन वहां भी विरोध के सुर कम नहीं हुए। जस्टिस वर्मा झुकने को तैयार नहीं थे, लेकिन संसद ने इस मामले को हाथ में ले लिया। भारतीय संसदीय इतिहास में बहुत कम ही ऐसा होता है जब किसी जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो। लोकसभा के 146 सदस्यों ने एकजुट होकर उनके खिलाफ प्रस्ताव पर साइन कर दिए। 

लोकसभा अध्यक्ष ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की। जस्टिस वर्मा ने इस समिति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी, लेकिन 16 जनवरी को वहां से भी उन्हें बड़ा झटका लगा। जब जस्टिस वर्मा को लगा कि अब संसद में महाभियोग के जरिए उनकी बर्खास्ती तय है और कानून के शिकंजे से बचना नामुमकिन है, तो उन्होंने आज शुक्रवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंप दिया। अपने त्यागपत्र में उन्होंने बड़े ही दार्शनिक अंदाज में लिखा कि "मैं उन कारणों का खुलासा नहीं करना चाहता जिनकी वजह से मुझे यह कदम उठाना पड़ रहा है, लेकिन भारी दुख के साथ मैं तत्काल प्रभाव से पद छोड़ रहा हूं।" 

दरअसल, लोकसभा सचिवालय के सूत्रों की मानें तो इस्तीफे के साथ ही अब महाभियोग की लंबी और जटिल प्रक्रिया खुद-ब-खुद समाप्त हो जाएगी। जाहिर है एक जज, जिसके घर से निकले जले हुए नोटों ने न्याय के मंदिर की शुचिता पर सवाल खड़े कर दिए थे, उसका अंत इस्तीफे के रूप में हुआ। हालांकि, उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों से हमेशा इनकार किया, लेकिन संसद की सख्ती और सबूतों के दबाव ने उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। अब सवाल यह है कि क्या इस्तीफा देने मात्र से वह जांच एजेंसियों के रडार से बाहर हो जाएंगे? या फिर आने वाले दिनों में यह कैश कांड कोई नया मोड़ लेगा? न्यायपालिका की साख पर लगे इस दाग की चर्चा सदियों तक होती रहेगी।

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