शायर, गीतकार और समाज के आवाज़ – कैफ़ी आज़मी
सैयद अतहर हुसैन रिज़वी, जिन्हें हम कैफ़ी आज़मी के नाम से जानते हैं, उर्दू साहित्य के उन महान प्रगतिवादी शायरों में से हैं जिन्होंने अपने कलम और गीतों से समाज की विसंगतियों और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई। 1919 में आज़मगढ़ के मौज़ा मजवाँ में जन्मे कैफ़ी का घराना ज़मींदार था और घर में ही शिक्षा और साहित्य का माहौल था।
शुरुआत में अरबी-फ़ारसी की पढ़ाई करने वाले कैफ़ी ने लखनऊ के सुल्तान-उल-मदारिस में शिक्षा ग्रहण की, लेकिन वहाँ की दकियानूसी व्यवस्था और सामाजिक अन्याय ने उन्हें प्रगतिशील और क्रांतिकारी विचारों की ओर मोड़ दिया। लखनऊ में उनके मिलन प्रगतिशील लेखकों से हुआ, और बाद में कानपुर में मजदूर आंदोलनों से जुड़कर उन्होंने मार्क्सवादी साहित्य का गहन अध्ययन किया।
आर्थिक कारणों से कैफ़ी ने फ़िल्मी गीत और स्क्रिप्ट लेखन भी किया। उनकी फ़िल्मी यात्राओं में ‘काग़ज़ के फूल’, ‘गर्म हवा’, ‘हीर राँझा’ और ‘हक़ीक़त’ जैसी यादगार फिल्में शामिल हैं। उनके गीत आज भी दिलों में गूँजते हैं।
कैफ़ी की शायरी हमेशा समाज की असमानता, शोषण और मानसिक दासता के खिलाफ़ रही। उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं:
- झंकार
- आख़िर-ए-शब
- आवारा सजदे
- मेरी आवाज़ सुनो (फ़िल्मी गीत)
- इबलीस की मजलिसे शूरा
आइये आज कैफ़ी आज़मी की जयंती पर आइए उनकी शायरी और विचारों को याद करें -
अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ
वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गईं

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