लखनऊ में वकीलों के चैंबरों पर चला बुलडोजर
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और नवाबों का शहर आज अखाड़ा बन गया! अदालत के रखवाले और कानून के रखवाले... यानी वकील और पुलिस, आमने-सामने आ गए! लखनऊ के कैसरबाग इलाके में रविवार की सुबह ऐसी 'संडे गदर' मचेगी, किसी ने सोचा नहीं था। एक तरफ गरजते हुए छह-छह पीले पंजे यानी योगी सरकार के बुलडोजर...तो दूसरी तरफ काले कोट में आक्रोशित वकीलों की भारी फौज! नारेबाजी, धक्का-मुक्की, और फिर वो हुआ जिसने राजधानी को हिलाकर रख दिया। तड़ातड़ बरसती पुलिस की लाठियां और चारों तरफ मचती अफरा-तफरी! हाईकोर्ट के एक आदेश पर लखनऊ के सिविल कोर्ट के बाहर वो महा-संग्राम छिड़ा है, जिसकी गूंज अब पूरे सूबे में सुनाई दे रही है। आखिर क्यों भड़की वकीलों की ये फौज? क्यों पुलिस को भांजनी पड़ी लाठियां? और क्या है इस बुलडोजर एक्शन के पीछे का पूरा सच? आइए आपको ले चलते हैं सीधे ग्राउंड जीरो पर, जहां इस वक्त भी माहौल बारूद की तरह सुलग रहा है!
दरअसल, रविवार की वह सुबह, जब अमूमन कचहरी में सन्नाटा रहता है, तभी अचानक खाकी वर्दी और नगर निगम की भारी-भरकम मशीनों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के सख्त निर्देश के बाद नगर निगम और जिला प्रशासन की टीमें पूरी तैयारी के साथ कैसरबाग स्थित कचहरी परिसर के बाहर पहुंच गईं। प्रशासन के साथ एक-दो नहीं, बल्कि पूरे 6 बुलडोजर थे। जैसे ही पीला पंजा आगे बढ़ा और वकीलों के चैंबरों को ढहाना शुरू किया, खबर आग की तरह फैल गई। देखते ही देखते छुट्टी के दिन भी सैकड़ों की तादाद में वकील जिनमें महिला वकील भी शामिल थीं मौके पर इकट्ठा हो गए। वकीलों ने नगर निगम की टीम को घेर लिया और उनके सामने ही खड़े हो गए। जिसके बाद माहौल पल भर में तनावपूर्ण हो गया। वकीलों के गुस्से का गुब्बारा फूट पड़ा और उन्होंने शासन-प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 'गो बैक' और 'पुलिस प्रशासन मुर्दाबाद' के गगनभेदी नारों से पूरा कैसरबाग इलाका दहल उठा। वकील अपने आशियाने को बचाने के लिए बुलडोजर के आगे अड़ गए। वहीं प्रशासन ने वकीलों को समझाने और पीछे हटाने की कोशिश की, लेकिन वकीलों का गुस्सा सातवें आसमान पर था। देखते ही देखते धक्का-मुक्की शुरू हो गई और अफरा-तफरी का माहौल बन गया। स्थिति जब पूरी तरह नियंत्रण से बाहर होने लगी, तो पुलिस ने मोर्चा संभाला। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने वकीलों पर लाठियां बरसानी शुरू कर दीं। लाठीचार्ज होते ही मौके पर भगदड़ मच गई। कई वकीलों को दौड़ा-दौड़ा कर हटाया गया, जिसके बाद पूरे इलाके को भारी पुलिस बल और PAC के जवानों ने अपने सुरक्षा घेरे में ले लिया।
दरअसल, इस पूरे महा-बवाल के पीछे हाईकोर्ट का वो आदेश है, जिसके तहत कोर्ट परिसर के आसपास फैले अतिक्रमण को साफ किया जाना था। नगर निगम के अधिकारियों के मुताबिक, कोर्ट परिसर के बाहर फुटपाथ और नालों पर अवैध रूप से चैंबर बना लिए गए थे। इसकी वजह से स्वास्थ भवन चौराहा से चकबस्त चौराहा, सदर तहसील, निबंधन कार्यालय, रेजिडेंसी से सीएमओ ऑफिस और स्वास्थ्य भवन से जिला सत्र न्यायालय की ओर जाने वाली सड़कें बेहद संकरी हो गई थीं। रोजाना यहां भयंकर जाम लगता था और आम जनता को भारी परेशानी झेलनी पड़ती थी। हाईकोर्ट के आदेश पर कुल 240 अवैध चैंबरों को ढहाने का लक्ष्य रखा गया था। प्रशासन का दावा है कि वकीलों को पहले ही नोटिस चस्पा कर खुद चैंबर हटाने का वक्त दिया गया था, और अब तक 150 से ज्यादा चैंबरों को जमींदोज किया जा चुका है।
वहीं दूसरी तरफ, प्रदर्शनकारी वकीलों ने प्रशासन की इस कार्रवाई की नीयत पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वकीलों का सीधा आरोप है कि प्रशासन ने हाईकोर्ट के आदेश का गलत इस्तेमाल किया और उसकी आड़ में ज्यादती की। वकीलों के मुताबिक अदालत ने केवल 72 चैंबरों को हटाने का निर्देश दिया था, लेकिन नगर निगम ने अपनी मनमर्जी चलाते हुए करीब 240 चैंबरों पर बुलडोजर चला दिया। उन्हें कोई उचित या समय से नोटिस नहीं दिया गया, बल्कि अचानक छुट्टी के दिन धोखे से कार्रवाई की गई। वर्षों से वे इन चैंबरों में बैठकर अपनी वकालत और रोजी-रोटी चला रहे थे। यह उनकी पेशेवर पहचान और सालों की मेहनत से जुड़ी जगह थी। बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के उनके चैंबर तोड़ दिए गए, जिससे उनका कामकाज पूरी तरह ठप हो जाएगा।
हालांकि वकीलों के भारी गुस्से और हंगामे के बावजूद प्रशासन इस बार पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहा है। मौके पर सुरक्षा व्यवस्था को अभेद्य किला बना दिया गया है। भारी पुलिस फोर्स की मौजूदगी के बीच बुलडोजर अपना काम कर रहे हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए डीसीपी वेस्ट कमलेश दीक्षित ने मोर्चा संभाला। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि यह पूरी कार्रवाई किसी व्यक्तिगत रंजिश में नहीं, बल्कि सीधे माननीय हाईकोर्ट के आदेश पर की जा रही है। उन्होंने कहा, "हम वकीलों को समझाने का प्रयास कर रहे हैं। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हमारे पास पूरी फोर्स मौजूद है।" हालांकि, तनाव को देखते हुए प्रशासन और वरिष्ठ वकीलों के बीच गतिरोध को खत्म करने के लिए बातचीत का दौर भी बैकस्टेज जारी है।
देखा जाए तो लखनऊ की सड़कों पर आज कानून के दो रक्षक ही आपस में भिड़ गए। एक तरफ आम जनता की सहूलियत और हाईकोर्ट का वो सख्त आदेश है, जिसका पालन कराना प्रशासन की मजबूरी भी है और जिम्मेदारी भी। तो दूसरी तरफ उन वकीलों के पेट पर लात पड़ने का दर्द है, जिनके चैंबर बिना किसी दूसरी व्यवस्था के पल भर में मलबे के ढेर में तब्दील कर दिए गए। 150 से ज्यादा चैंबर टूट चुके हैं, लाठियां चल चुकी हैं और कैसरबाग में पसरा सन्नाटा किसी बड़े तूफान से पहले की शांति जैसा लग रहा है। अब देखना यह होगा कि वकीलों का यह गुस्सा आने वाले दिनों में क्या नया मोड़ लेता है? क्या प्रशासन सभी 240 चैंबरों को गिराकर ही दम लेगा या फिर वकीलों के इस उग्र विरोध के आगे उसे अपने कदम पीछे खींचने पड़ेंगे?


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