कानपुर में टाइपिंग की रफ्तार नहीं मिली, तो बाबू से बना दिया चपरासी!

अमूमन आपने देखा होगा कि सरकारी दफ्तरों में प्रमोशन के लिए खींचतान होती है, लेकिन कानपुर कलेक्ट्रेट से आज एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने सबकों हैरान कर दिया। जी हां, यहाँ तीन बाबू अपनी कुर्सी नहीं बचा पाए और सीधे अर्श से फर्श पर आ गिरे। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इसकी वजह कोई भ्रष्टाचार या अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि टाइपिंग रफ्तार है! 

दरअसल, कलेक्ट्रेट के तीन बाबू साहब एक मिनट में 25 शब्द तक नहीं लिख पाए और नतीजा ये हुआ कि डीएम साहब ने कलम उठाई और उन्हें बाबू से सीधे चपरासी बना दिया। जिसके बाद अब फाइलें टाइप नहीं, बल्कि उठानी पड़ेंगी। आपको बता दें कि सरकारी नियमों के मुताबिक, क्लर्क के पद पर बने रहने के लिए हिंदी टाइपिंग में 25 शब्द प्रति मिनट की रफ्तार अनिवार्य है। लेकिन, जब इन तीनों की अग्निपरीक्षा हुई, तो इनकी उंगलियां की-बोर्ड पर उस रफ्तार से नहीं चल पाईं जो सरकारी फाइलें दौड़ने के लिए जरूरी थीं। खास बात ये है कि यह कार्रवाई अचानक नहीं हुई है। प्रशासन ने इन कर्मचारियों को सुधरने के पूरे मौके दिए थे। 2024 में जब पहली बार टाइपिंग टेस्ट हुआ, तो ये तीनों फेल हो गए। प्रशासन ने नरमी दिखाते हुए सिर्फ सैलरी इंक्रीमेंट रोका और चेतावनी देकर छोड़ दिया। फिर 2025 की परीक्षा में इन बाबूओं के लिए 'करो या मरो' का मौका था। एक साल का लंबा वक्त मिलने के बावजूद, जब दोबारा परीक्षा हुई, तो नतीजा फिर वही ढाक के तीन पात ही रहा! तीनों कर्मचारी निर्धारित मानक को छू तक नहीं पाए। जहां लगातार दूसरी बार नाकामी मिलने के बाद जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने कड़ा रुख अपनाया। 

उन्होंने साफ कर दिया कि कलेक्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण दफ्तर में, जहाँ सारा काम फाइलों और नोटिंग पर टिका है, वहां ऐसी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। डीएम के आदेश पर तीनों को कनिष्ठ लिपिक के पद से हटाकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बना दिया गया है। अब ये कर्मचारी फाइलों पर नोटिंग लिखने के बजाय ऑफिस के अन्य बुनियादी कार्यों में हाथ बटाएंगे। दिलचस्प बात यह है कि इन तीनों की नियुक्ति मृतक आश्रित कोटे के तहत हुई थी। अक्सर माना जाता है कि इस कोटे की नौकरी सुरक्षित रहती है, लेकिन कानपुर डीएम ने ये साफ कर दिया कि सहानुभूति अपनी जगह है और कार्यकुशलता अपनी जगह। नियुक्ति की शर्त थी कि एक साल के भीतर टाइपिंग सीखनी होगी, जो ये बाबू पूरी नहीं कर सके। वहीं इस कार्रवाई के बाद पूरे कानपुर प्रशासन में हड़कंप मच गया है। 

दफ्तरों में चर्चा है कि अब सिर्फ कुर्सी पर बैठना काफी नहीं होगा, बल्कि काम की स्पीड भी दिखानी होगी। जहाँ कुछ लोग इसे कर्मचारियों के साथ सख्ती बता रहे हैं, वहीं आम जनता इसे एक बेहतरीन कदम मान रही है क्योंकि इससे सरकारी कामकाज में तेजी आएगी। वहीं ये घटना एक बड़ा सबक है कि चाहे नौकरी किसी भी कोटे से मिली हो, अगर आप खुद को अपडेट नहीं करेंगे, तो सिस्टम आपको डिलीट या डिमोशन करने में देर नहीं लगाएगा। कानपुर डीएम के इस फैसले ने 'डिजिटल गवर्नेंस' की तरफ एक मजबूत कदम बढ़ाया है। अब देखना ये होगा कि क्या बाकी जिलों के सुस्त बाबू भी इस खबर से कोई सबक लेते हैं या नहीं? 

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