कानपुर किडनी कांड: बेगूसराय के आयुष की 'बर्बादी' से खुला इंटरनेशनल कनेक्शन

उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ऐसे 'मौत के सौदागरों' के गिरोह का पर्दाफाश हुआ है, जो गरीबी की मजबूरी को ओटी की मेज तक ले जाते थे। जहां डॉक्टरों को भगवान का दर्जा दिया जाता है, वहीं कानपुर के इस किडनी सिंडिकेट ने सफेद कोट को दागदार कर दिया है। महज 50 हजार रुपये के विवाद से शुरू हुई यह कहानी अब इंटरनेशनल कनेक्शन तक पहुंच गई है। पुलिस की रेड, फरार डॉक्टर, और नोटों की गड्डियों वाले वीडियो ने पूरे प्रदेश में हड़कंप मचा दिया है।

दरअसल, इस पूरे रैकेट की नींव बिहार के बेगूसराय के रहने वाले आयुष की मजबूरी पर टिकी थी। एमबीए की पढ़ाई कर रहा आयुष नशे और अय्याशी की लत में अपनी 18 बीघा पुश्तैनी जमीन गंवा चुका था। जब पैसे खत्म हुए, तो उसने टेलीग्राम के जरिए किडनी तस्करों से संपर्क किया। सौदा हुआ 10 लाख रुपये में, लेकिन जब ऑपरेशन के बाद उसे वादे से 50 हजार रुपये कम मिले, तो बदले की आग में उसने पुलिस के सामने अपना ही गुनाह कबूल कर लिया। आयुष का यह कदम इस सिंडिकेट के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ। 

जहां पुलिस ने इस मामले में तीन मुख्य किरदारों डॉ. रोहित, डॉ. अली और डॉ. अफजाल को वांटेड घोषित कर उन पर 25-25 हजार रुपये का इनाम रखा है। मास्टरमाइंड डॉ. रोहित,  गाजियाबाद का रहने वाला यह डॉक्टर पर्दे के पीछे से पूरा नेटवर्क चलाता था। डॉ. अफजाल का एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें वह नोटों की गड्डियों के साथ दिख रहा है। माना जा रहा है कि यह वही खून की कमाई है जो अवैध ट्रांसप्लांट से आई थी। वहीं डॉ. अली उर्फ मुद्दसर अली वह शख्स है जो चाकू चलाकर किडनी निकालने और लगाने का काम करता था। 

वहीं जांच में एक और चौंकाने वाला नाम सामने आया है....अजय। यह शख्स एक सरकारी अस्पताल में महज 20 हजार की नौकरी करने वाला सिक्योरिटी गार्ड है, लेकिन इसकी असलियत जानकर पुलिस के होश उड़ गए। अजय खुद एक अस्पताल का मालिक रह चुका है और इसका मुख्य काम था जरूरतमंद मरीजों को डोनर से मिलवाना। एक मामूली गार्ड के पास अस्पताल खोलने का पैसा कहां से आया? यह सवाल अब पुलिस की जांच के केंद्र में है। वहीं मौत का ये व्यापार कैसे चलता था, ये भी आपको बता देते हैं। 

दरअसल, इस गिरोह का काम करने का तरीका प्रोफेशनल कंपनियों जैसा था। एम्बुलेंस चालक शिवम अग्रवाल टेलीग्राम पर उन युवाओं को ढूंढता था जिन्हें पैसों की सख्त जरूरत होती थी। डोनर को 10 लाख का लालच दिया जाता था, जबकि किडनी के जरूरतमंद रईस मरीजों से 60 लाख रुपये तक वसूले जाते थे। कल्याणपुर के मेड लाइफ, आहूजा और प्रिया अस्पताल जैसे केंद्रों का इस्तेमाल सर्जरी के लिए होता था। अब इन अस्पतालों को सील कर दिया गया है। पुलिस को अंदेशा है कि इस गिरोह ने अब तक 40 से 50 अवैध ट्रांसप्लांट किए हैं, जिनके तार दिल्ली, मुंबई और नेपाल तक फैले हुए हैं।

वहीं आयुष की कहानी किसी फिल्मी ट्रेजेडी से कम नहीं है। पिता चाहते थे बेटा डॉक्टर बने, लेकिन प्यार और नशे ने उसे बर्बाद कर दिया। एयर होस्टेस से शादी, जमीन बेचना और फिर परिवार से बेदखल होना...आयुष की जिंदगी के इन पन्नों ने उसे किडनी बेचने के मोड़ पर खड़ा कर दिया। आज आयुष पुलिस की कस्टडी में अस्पताल के बिस्तर पर है, और उसका पूरा परिवार गायब है। वहीं कानपुर पुलिस की इस बड़ी कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि सफेदपोश अपराधियों की अब खैर नहीं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर कितने और 'आयुष' इन गिरोहों के चंगुल में फंसे हैं? 9 गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, 3 मुख्य डॉक्टर फरार हैं, और करोड़ों का हिसाब अभी बाकी है। 

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