काशी की धरती से साहित्य साधना की शुरुआत..
हिंदी साहित्य के इतिहास में जिस लेखक ने समाज के यथार्थ, शोषण, गरीबी, नारी पीड़ा और मानवीय संवेदनाओं को सबसे सशक्त स्वर दिया, वे थे मुंशी प्रेमचंद्र.‘उपन्यास सम्राट’ और ‘कलम के जादूगर’ के नाम से विख्यात प्रेमचंद्र ने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज सुधार और विचार चेतना का माध्यम बनाया. उनका साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अपने समय में था.
जन्म और प्रारंभिक जीवन
मुंशी प्रेमचंद्र का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही गांव में एक कायस्थ परिवार में हुआ. उनका मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था. पिता मुंशी आजायबराय और माता आनंदी देवी थीं. बचपन में ही माता का निधन हो जाने से उनका जीवन संघर्षों से भर गया। सौतेली मां का कठोर व्यवहार और अल्प आय ने उन्हें कम उम्र में ही जीवन की कठोर सच्चाइयों से परिचित करा दिया। काशी में हुई उनकी प्रारंभिक शिक्षा ने उनके साहित्यिक संस्कारों की नींव रखी.
संघर्षपूर्ण वैवाहिक जीवन
कम उम्र में उनकी पहली शादी ऐसे निर्णय के रूप में हुई, जिसने उनके जीवन को और कठिन बना दिया .यह विवाह सफल नहीं रहा. बाद में 1906 में उन्होंने शिवरानी देवी, एक बाल विधवा, से विवाह किया. यह विवाह प्रेमचंद्र के जीवन में स्थिरता और प्रेरणा लेकर आया. शिवरानी देवी ने उनके लेखन जीवन में महत्वपूर्ण सहयोग दिया, जिससे उनका साहित्य और अधिक परिपक्व हुआ.
साहित्यिक यात्रा की शुरुआत
प्रेमचंद्र ने अपने लेखन की शुरुआत उर्दू भाषा में ‘नवाब राय’ नाम से की। उनका पहला कहानी संग्रह ‘सोज़े वतन’ 1908 में प्रकाशित हुआ, जिसमें देशभक्ति की तीव्र भावना थी. अंग्रेज़ सरकार ने इसे जब्त कर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद उन्होंने प्रेमचंद्र नाम से हिंदी में लेखन प्रारंभ किया। 1918 में प्रकाशित उपन्यास ‘सेवासदन’ ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई.
प्रेमचंद्र युग और प्रमुख कृतियां..
1918 से 1936 तक का कालखंड हिंदी साहित्य में ‘प्रेमचंद्र युग’ के नाम से जाना जाता है. इस दौरान उन्होंने गोदान, गबन, निर्मला, कर्मभूमि, रंगभूमि जैसे कालजयी उपन्यास रचे. उनकी कहानियाँ ,कफन, पूस की रात, पंच परमेश्वर, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा ,आज भी सामाजिक यथार्थ का जीवंत दस्तावेज हैं। उन्होंने लगभग 18 उपन्यास और 300 से अधिक कहानियाँ लिखीं.
संपादन और विचारक के रूप में योगदान
प्रेमचंद्र केवल कथाकार ही नहीं, बल्कि एक गंभीर विचारक भी थे. उन्होंने ‘हंस’ और ‘जागरण’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया। उनका निबंध ‘साहित्य का उद्देश्य’ साहित्य को समाज से जोड़ने की उनकी दृष्टि को स्पष्ट करता है.
निधन और साहित्यिक विरासत
8 अक्टूबर 1936 को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया. आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने जीवन भर साहित्य साधना नहीं छोड़ी. आज भी मुंशी प्रेमचंद्र की रचनाएँ हिंदी साहित्य की आधारशिला मानी जाती हैं और आने वाली पीढ़ियों को सच, संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाती रहती हैं.मुंशी प्रेमचंद्र केवल एक लेखक नहीं, बल्कि एक युग थे, ऐसा युग, जिसने हिंदी साहित्य को यथार्थ, मानवता और सामाजिक चेतना की नई दिशा दी.


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