आस्था इतिहास और श्रद्धा का संगम विजयराघवगढ़ की माँ शारदा का दिव्य धाम
कटनी : विजयराघवगढ़ धर्म आस्था और प्राचीन परंपराओं से ओत-प्रोत विजयराघवगढ़ नगरी आज भी अपनी दिव्यता और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए जानी जाती है। यहां विराजित माँ शारदा का दरबार केवल एक मंदिर नहीं बल्कि श्रद्धालुओं की अटूट आस्था विश्वास और भक्ति का जीवंत केंद्र है।मान्यता है कि विजयराघवगढ़ की माँ शारदा मैहर वाली शारदा माता की बड़ी बहन हैं। प्राचीन काल में जब मैहर और विजयराघवगढ़ एक ही रियासत हुआ करती थी तब दोनों स्थानों का आध्यात्मिक संबंध अत्यंत गहरा था। समय के साथ रियासतों का विभाजन हुआ और इसी के साथ माँ शारदा की प्रतिमाएं भी दो धामों में विराजमान हो गईं।जहां छोटी बहन मैहर की ऊंची त्रिकूट पर्वत की चोटी पर विराजित होकर देशभर में प्रसिद्ध हो गईं वहीं विजयराघवगढ़ की बड़ी बहन एक समय श्रापित रियासत के कारण जनमानस की दृष्टि से ओझल रहीं। किंतु जैसे ही इस भूमि ने श्राप से मुक्ति पाई माँ शारदा की पुनः स्थापना हुई और भक्ति का प्रवाह फिर से प्रारंभ हुआ।धार्मिक मान्यता आज भी यही कहती है कि पहले बड़ी बहन विजयराघवगढ़ की माँ शारदा के दर्शन करने के बाद ही मैहर धाम के दर्शन पूर्ण फलदायी होते हैं। यही कारण है कि श्रद्धालु पहले इस पावन धाम में शीश नवाकर फिर मैहर की यात्रा करते हैं।नवरात्रि के पावन पर्व में तो यहाँ आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है। दोनों ही नौ दुर्गा के अवसर पर मंदिर परिसर से लेकर दूर-दूर तक भक्तों की लंबी कतारें जय माँ शारदा के जयकारों से गूंज उठती हैं। हर भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार चुनरी नारियल सिंदूर और पुष्प अर्पित कर माँ का आशीर्वाद प्राप्त करता है।मंदिर में माँ का अलौकिक श्रृंगार लाल चुनरी से सुसज्जित मस्तक और दीपों की ज्योति ऐसा दिव्य वातावरण निर्मित करती है। मानो स्वयं आदिशक्ति वहां साक्षात विराजमान हों। पीढ़ियों से सेवा में लगे पुजारी परिवार माँ की नित्य पूजा-अर्चना कर इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।विजयराघवगढ़ को धार्मिक नगरी के रूप में स्थापित करने का श्रेय तत्कालीन राजा सरयू प्रसाद को भी जाता है जिन्होंने अनेक मंदिरों का निर्माण कराकर इस भूमि को आध्यात्मिक पहचान प्रदान की। यहां स्थित बंजारी माई, किले वाले बरमदेव पंचमठा धाम संकट मोचन जगन्नाथ धाम झिरियां घाट कारीतलाई और गौरहा के विजय नाथ जैसे पावन स्थल आज भी इतिहास और आस्था के साक्षी हैं।हालांकि समय के साथ कई प्राचीन धरोहर कुएं बावड़ियां और वन क्षेत्र मानव की उपेक्षा और लालच के कारण विलुप्ति की कगार पर पहुंच गए हैं लेकिन मंदिरों में विराजित देवी-देवताओं की आस्था आज भी अडिग है। यह पावन नगरी आज भी हर पर्व हर शुभ अवसर पर भक्तों की भक्ति से सराबोर रहती है। जगह-जगह भंडारे माता के चरणों में चुनरी अर्पण और अखंड ज्योति का प्रज्वलन इस बात का प्रमाण है कि विजयराघवगढ़ में धर्म केवल परंपरा नहीं बल्कि जीवन का आधार है।माँ शारदा का यह धाम आज भी हर भक्त को यही संदेश देता है। श्रद्धा रखो विश्वास रखो माँ की कृपा से हर कष्ट दूर होगा।
रिपोर्टर : सुमित जायसवाल

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