कौशांबी में किसानों की नई दिशा: केसर आम की बागवानी से बढ़ा रहे मुनाफा

उत्तर प्रदेश के कौशांबी जनपद में अब किसान परंपरागत खेती छोड़कर नई तकनीकी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे उन्हें कम समय और लागत में अधिक मुनाफा मिलने की उम्मीद है। किसान अब विदेशी फलों और तकनीकी बागवानी की तरफ आकर्षित हो रहे हैं।
 
विदेशी फलों की बागवानी में बदलाव
 
कौशांबी जिले के शहजादपुर गांव के कृष्ण देव त्रिपाठी, जो पहले पुस्तैनी खेती में ही लगे हुए थे, ने अब नई दिशा में कदम बढ़ाया है। उन्होंने परंपरागत फसलें छोड़कर केसर प्रजाति के विदेशी आम की बागवानी शुरू की। इस बार उन्होंने लगभग तीन बीघे में 900 केसर आम के पेड़ लगाए हैं। उनका मानना है कि विदेशी फलों की बागवानी कम समय में अधिक मुनाफा देती है और यह किसानों के लिए एक फायदेमंद विकल्प बन सकता है।
 
केसर आम की बागवानी की तकनीक
 
केसर आम की बागवानी में पौधों की रोपाई तीन फीट की दूरी पर की जाती है। शुरुआती चरण में पौधों की ऊंचाई लगभग 2 से 2.5 फीट होती है, जो बाद में बढ़कर 7 से 8 फीट तक पहुंच जाती है। इस पौधे पर फल तोड़ने का काम भी सरल होता है, और छोटे बच्चे भी इसे आसानी से कर सकते हैं।
 
सिंचाई और छटाई का महत्व
 
केसर आम की बागवानी में पानी की सही व्यवस्था के लिए ड्रिप सिंचाई का उपयोग किया जाता है। इसके साथ ही नियमित छटाई से पौधों की वृद्धि और फलन में तेजी आती है। छटाई से पौधों की ताकत बढ़ती है, जिससे अधिक फल लगते हैं और उनका आकार भी बढ़ता है।
 
बेहतर बाजार मूल्य और मुनाफा
 
केसर आम के पौधे लगभग पांच साल में पूरी तरह से विकसित हो जाते हैं और फल देना शुरू कर देते हैं। एक पौधे से 20-25 किलो फल प्राप्त हो सकते हैं, जिन्हें बाजार में 150-200 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचा जाता है। इससे किसानों को अच्छा खासा लाभ मिलता है।
 
महाराष्ट्र से लाकर की खेती की शुरुआत
 
कृष्ण देव त्रिपाठी ने केसर आम के पौधे महाराष्ट्र से लाकर अपने खेतों में लगाए। एक पौधे की कीमत लगभग 150 रुपये होती है, और यह दूसरे साल से फल देना शुरू कर देता है। हालांकि, छोटे पौधों पर जल्द फल लगाने से नुकसान हो सकता है, इसलिए उन्हें 2-3 साल के बाद फल देना चाहिए।
 
निष्कर्ष
 
कृष्ण देव त्रिपाठी की तरह, अन्य किसान भी अब विदेशी फलों और नई तकनीक का उपयोग कर अपनी कृषि में विविधता ला रहे हैं। इसके साथ ही कम लागत और कम समय में अधिक मुनाफा कमाने का यह तरीका किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रहा है।

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