केरल में कांग्रेस का 10 साल का वनवास खत्म, पुडुचेरी में फिर खिला 'कमल'
4 मई 2026 की तारीख भारतीय राजनीति में एक महा-बदलाव की गवाह बनी है। जी हां बीते दिन जब दक्षिण भारत से चुनावी नतीजों की गर्जना सुनाई दी, तो दिल्ली के गलियारों तक सियासी हलचल तेज़ हो गई। केरल के लाल किले से लेकर पुडुचेरी के समंदर किनारे तक... चुनाव की लहर बिल्कुल साफ है! आपको बता दें सबसे बड़ी खबर केरल से है जहाँ कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF ने 10 साल का वनवास खत्म करते हुए कम्युनिस्टों के अभेद्य दुर्ग को ढहा दिया है। कांग्रेस ने 140 में से 63 सीटें जीतकर शानदार वापसी की है, जबकि सत्ता के शिखर से फिसलकर CPIM महज़ 26 सीटों पर सिमट गई है।
हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। यह जीत कांग्रेस के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है, क्योंकि अब देश में कांग्रेस के पास एक साथ 4 मुख्यमंत्री होने का नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बन गया है! लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती! जहाँ केरल में बदलाव की बयार थी, वहीं पुडुचेरी ने एक बार फिर NDA को चुना। जी हां पुडुचेरी की 30 सदस्यीय विधानसभा में NDA ने 18 सीटों के आरामदायक बहुमत के साथ सत्ता में धमाकेदार वापसी की है। मुख्यमंत्री एन. रंगास्वामी की पार्टी AINRC ने 12 सीटें जीती हैं, जबकि भाजपा के खाते में 4 सीटें आई हैं। रंगास्वामी ने अपनी थट्टांचावड़ी सीट से 4,336 वोटों के अंतर से जीत दर्ज कर चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की राह साफ कर ली है। वहीं, यहाँ कांग्रेस महज़ 1 सीट पर सिमट कर रह गई है और DMK को 5 सीटें मिली हैं।
दरअसल, इस जीत के साथ ही कांग्रेस ने एक बड़ा मिथक तोड़ दिया है। वहीं इस जीत की सबसे बड़ी खबर यह है कि अब देश में कांग्रेस के पास एक साथ 4 मुख्यमंत्री हिमाचल, कर्नाटक, तेलंगाना और अब केरल होंगे। 2019 के बाद यह पहली बार है जब कांग्रेस ने '3 के फेर' को पार किया है। आपको बता दें केसी वेणुगोपाल, रमेश चेन्निथल्ला और वीडी सतीशन की तिकड़ी ने आपसी टशन को किनारे रखकर एकजुटता दिखाई। प्रियंका गांधी की सक्रियता और स्थानीय स्तर पर 3 छोटी पार्टियों को साथ जोड़ने का मास्टरस्ट्रोक कांग्रेस के लिए गेम चेंजर साबित हुआ।
वहीं भाजपा के बढ़ते प्रभाव को कांग्रेस ने मुद्दा बनाया, जिससे मुस्लिम और ईसाई मतदाता कांग्रेस के पक्ष में पूरी तरह लामबंद हो गए। परिणाम यह रहा कि बीजेपी महज 2 सीटों पर सिमट कर रह गई। आपको बता दें जहाँ केरल में बदलाव की लहर थी, वहीं पुडुचेरी में जनता ने एक बार फिर भाजपा को चुना है। जी हां पुडुचेरी विधानसभा चुनाव 2026 के परिणामों ने एनडीए की जड़ों को दक्षिण में और गहरा कर दिया है।
देखा जाए तो केरल और पुडुचेरी के इन नतीजों ने देश की राजनीति को दो बड़े संकेत दिए हैं। पहला-केरल की जीत यह साबित करती है कि अगर कांग्रेस क्षेत्रीय क्षत्रपों को साधे और एकजुट होकर लड़े, तो वह भाजपा और वामपंथ दोनों को चुनौती दे सकती है। दूसरा-पुडुचेरी की जीत भाजपा के लिए तमिलनाडु और अन्य द्रविड़ राज्यों में प्रवेश का 'प्रवेश द्वार' बन गई है। पार्टी ने यहाँ साबित किया कि वह केवल हिंदू पॉलिटिक्स पर नहीं, बल्कि रणनीतिक गठबंधन और स्थानीय नेतृत्व के भरोसे भी दक्षिण फतह कर सकती है।
ऐसे में चुनाव के ये नतीजे भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में संतुलन का एक नया अध्याय हैं। केरल ने कांग्रेस को संजीवनी दी है, तो पुडुचेरी ने एनडीए को दक्षिण का विश्वास। एक ओर विजयन सरकार के 15 साल के वर्चस्व का अंत हुआ, तो दूसरी ओर रंगास्वामी ने अपनी लोकप्रियता का लोहा मनवाया। सत्ता की यह गंगा अब दक्षिण से होते हुए राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों को किस तरह प्रभावित करेगी, यह आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल, कांग्रेस के लिए '4 सीएम' का आंकड़ा और एनडीए के लिए पुडुचेरी का 'कमल' जश्न की बड़ी वजह है।


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