‘नसबंदी के बाद भी डॉगी 6 बच्चों का पिता!’ खंडवा में अनोखा विरोध

मध्य प्रदेश के खंडवा से आई ये तस्वीर देखकर आप भी एक पल के लिए हैरान रह जाएंगे...शरीर इंसान का, लेकिन चेहरा कुत्ते वाला! जी हां कलेक्टर की जनसुनवाई में अचानक एक शख्स डॉगी का मुखौटा और वेशभूषा पहनकर पहुंचा तो वहां मौजूद लोग देखते ही रह गए। कुछ देर के लिए माहौल में हंसी-मजाक जरूर हुआ, लेकिन इस अजीबोगरीब दिखने वाले प्रदर्शन के पीछे उठाया गया मुद्दा बेहद गंभीर था।

दरअसल, मंगलवार को मध्य प्रदेश के खंडवा में कलेक्टर की जनसुनवाई चल रही थी। लोग अपनी-अपनी समस्याएं लेकर अधिकारियों के सामने पहुंच रहे थे। कोई सड़क की शिकायत लेकर आया था, कोई बिजली-पानी की समस्या लेकर, तो कोई प्रशासन से अपनी दूसरी परेशानी का समाधान मांग रहा था। लेकिन इसी बीच जनसुनवाई के बाहर अचानक लोगों की नजर एक ऐसे शख्स पर पड़ी, जिसे देखकर हर कोई चौंक गया। शरीर इंसान का...कपड़े डॉगी वाले...और चेहरे पर कुत्ते का मुखौटा। कुछ ही देर में लोगों को समझ आया कि यह कोई मजाक या मनोरंजन का हिस्सा नहीं है, बल्कि एक विरोध प्रदर्शन है। खंडवा नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष दीपक उर्फ मुल्लू राठौर एक युवक को कुत्ते की वेशभूषा में लेकर कलेक्टर सभागृह पहुंचे थे। उनका मकसद था शहर में लगातार बढ़ रही आवारा कुत्तों की समस्या और उनकी नसबंदी के नाम पर खर्च किए गए कथित लाखों रुपये को लेकर प्रशासन का ध्यान खींचना। दरअसल, खंडवा नगर निगम में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और उनकी नसबंदी के नाम पर खर्च किए गए करीब 40 लाख रुपये को लेकर नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष दीपक उर्फ मुल्लू राठौर ने अनोखे अंदाज में विरोध दर्ज कराया। 

नेता प्रतिपक्ष का आरोप है कि पिछले चार साल में आवारा कुत्तों की नसबंदी के नाम पर लाखों रुपये खर्च कर दिए गए, लेकिन शहर में कुत्तों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ती चली गई। इतना ही नहीं, उनके मुताबिक इसी दौरान 13 हजार 225 लोग डॉग बाइट का शिकार हुए। विरोध का अंदाज भी ऐसा था कि सुनने वाले दंग रह जाएं। व्यंग्य करते हुए कहा गया कि नसबंदी के बाद भी डॉगी छह बच्चों का पिता बन गया! ऐसे में अब सवाल सीधा है कि अगर नसबंदी के नाम पर लाखों रुपये खर्च हुए हैं, तो फिर आवारा कुत्तों की संख्या पर लगाम क्यों नहीं लगी? अगर काम हुआ है तो उसका रिकॉर्ड कहां है? कितने कुत्तों की नसबंदी हुई? किस कंपनी ने काम किया? किसे भुगतान हुआ? और आखिर चार साल में हजारों लोगों के डॉग बाइट का शिकार होने की नौबत क्यों आई? इन्हीं सवालों के साथ खंडवा की जनसुनवाई में हुआ ये अनोखा प्रदर्शन अब चर्चा का विषय बन गया है...

वहीं यह बात सुनकर वहां मौजूद कई लोगों के चेहरे पर मुस्कान भी आई, लेकिन प्रदर्शन के पीछे की शिकायत को अधिकारियों ने गंभीरता से लिया। बताया गया कि शुरुआत में जब युवक डॉगी की ड्रेस पहनकर कलेक्टर सभागृह के बाहर पहुंचा तो वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने उसे रोकने की कोशिश की। लेकिन बाद में अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद उसे अंदर जाने दिया गया। अंदर पहुंचने के बाद डॉगी के रूप में आए युवक ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। उसने कुत्ते की तरह आवाज निकालकर भी दिखाई, जिससे वहां कुछ देर के लिए माहौल हल्का-फुल्का हो गया। लेकिन इसके बाद नेता प्रतिपक्ष दीपक राठौर ने अधिकारियों को ज्ञापन सौंपते हुए पूरे मामले की जांच की मांग की। वहीं अब आते हैं असली आरोप पर...आपको बता दें नेता प्रतिपक्ष का आरोप है कि कुत्तों की नसबंदी के नाम पर नगर निगम से करीब 40 लाख रुपये खर्च किए गए हैं, लेकिन जमीन पर काम हुआ या नहीं, इस पर गंभीर सवाल हैं। उन्होंने मांग की है कि पूरे मामले की वित्तीय और तकनीकी जांच कराई जाए। सिर्फ इतना ही नहीं, उन्होंने नसबंदी के काम से जुड़े टेंडर की पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग भी की है। 

किस कंपनी को टेंडर मिला?
कंपनी की पात्रता क्या थी?
उसने कौन-कौन से दस्तावेज जमा किए?
कितने कुत्तों की नसबंदी करने का ठेका दिया गया?
वास्तव में कितने कुत्तों की नसबंदी हुई?
कौन-कौन से कुत्तों की नसबंदी हुई, इसकी पहचान कैसे की गई?
उसके बाद कंपनी को कितना भुगतान किया गया?

और सबसे बड़ा सवाल क्या मौके पर जाकर काम का भौतिक सत्यापन हुआ या सिर्फ कागजों पर ही नसबंदी पूरी कर दी गई? इन सभी बिंदुओं की जांच की मांग की गई है। यानी अब मामला सिर्फ आवारा कुत्तों की समस्या तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल नगर निगम की कार्यप्रणाली, टेंडर प्रक्रिया और सरकारी पैसे के इस्तेमाल तक पहुंच गया है। वहीं दूसरी तरफ डॉग बाइट का मुद्दा भी बेहद अहम है। नेता प्रतिपक्ष का कहना है कि अगर चार साल में करीब 40 लाख रुपये कुत्तों की नसबंदी पर खर्च किए गए, तो फिर शहर में डॉग बाइट की घटनाएं कम क्यों नहीं हुईं? उनके मुताबिक सरकारी आंकड़ों में चार साल के दौरान 13 हजार 225 लोग कुत्तों के काटने का शिकार हुए। अगर ये आंकड़ा सही है, तो यह सिर्फ एक प्रशासनिक या राजनीतिक मुद्दा नहीं है। यह सीधे आम लोगों की सुरक्षा से जुड़ा सवाल है। क्योंकि आवारा कुत्तों के हमले का सबसे ज्यादा डर बच्चों और बुजुर्गों को रहता है। गलियों और मोहल्लों में झुंड बनाकर घूमते कुत्ते कई बार राहगीरों पर हमला कर देते हैं। बाइक सवारों के पीछे दौड़ते कुत्तों से दुर्घटनाओं का खतरा भी बना रहता है। ऐसे में नसबंदी और आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने के लिए यदि सरकारी पैसा खर्च किया जा रहा है, तो उसका असर जमीन पर दिखाई देना चाहिए।

यही सवाल लेकर नेता प्रतिपक्ष ने प्रशासन का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने साफ चेतावनी दी कि अगर मामले में उचित कार्रवाई नहीं हुई, तो वह धरने पर बैठेंगे। वहीं अब प्रशासन का पक्ष भी सुनिए। दरअसल, अपर कलेक्टर काशीराम बड़ोले ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए कहा कि मामले की जांच कराई जाएगी। उन्होंने बताया कि कुत्तों के बधियाकरण के नाम पर करीब 40 लाख रुपये के बिल निकाले जाने और काम नहीं होने से जुड़ी शिकायत मिली है। उन्होंने कहा कि मामले की जांच के लिए कमेटी बनाई जाएगी और जांच में यदि कोई दोषी पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। अपर कलेक्टर ने नगर निगम आयुक्त से भी इस मामले में चर्चा की है। यानी फिलहाल प्रशासन ने शिकायत को खारिज नहीं किया है, बल्कि जांच कराने की बात कही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जांच में क्या सामने आता है?

देखा जाए तो तो खंडवा में डॉगी बनकर जनसुनवाई में पहुंचा ये युवक भले ही कुछ मिनटों के लिए लोगों के चेहरे पर मुस्कान ले आया हो, लेकिन उसके पीछे उठाया गया सवाल बेहद गंभीर है। अगर चार साल में कुत्तों की नसबंदी के नाम पर करीब 40 लाख रुपये खर्च हुए हैं, तो फिर आवारा कुत्तों की संख्या कम क्यों नहीं हुई? फिलहाल आरोप हैं... प्रशासन ने जांच का भरोसा दिया है... कमेटी बनने की बात कही गई है... और अब सबकी नजर इस बात पर है कि जांच में आखिर क्या निकलकर सामने आता है। अगर शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो सरकारी पैसे के इस्तेमाल और टेंडर प्रक्रिया में जिम्मेदारी तय करना बेहद जरूरी होगा। और अगर आरोप गलत साबित होते हैं, तो वह भी जनता के सामने साफ होना चाहिए। क्योंकि मामला सिर्फ 40 लाख रुपये का नहीं है...मामला शहर के लोगों की सुरक्षा का भी है। फिलहाल इसका जवाब अब जांच के बाद ही मिलेगा। 

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