मकर संक्रांति पर एक कटोरी खिचड़ी दान से समृद्धि

एक छोटे से गाँव में हरि नाम का एक निर्धन किसान रहता था। उसके पास धन नहीं था, लेकिन उसका मन सदा संतोष से भरा रहता था। मकर संक्रांति के दिन गाँव में दान-पुण्य का बड़ा आयोजन था। लोग तरह-तरह के पकवान बनाकर दान कर रहे थे, लेकिन हरि के पास केवल थोड़े से चावल और दाल थी।

हरि ने सोचा, “मेरे पास भले ही अधिक न हो, लेकिन जो है, वही सच्चे मन से भगवान को अर्पित करूँ।” उसने सादी सी खिचड़ी बनाई और उसे मंदिर में दान कर दिया। उसी दिन एक साधु गाँव में आए। जब उन्होंने हरि की श्रद्धा और सादगी देखी, तो प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद दिया।

कुछ समय बाद हरि के जीवन में सुख और समृद्धि आने लगी। उसकी फसल अच्छी हुई और उसका जीवन सरल होते हुए भी सुखमय बन गया। हरि समझ गया कि भगवान को भोग में स्वाद नहीं, भाव और नीयत प्रिय होती है।

 

शिक्षा :

सच्चे मन से किया गया छोटा सा दान भी बड़ा फल देता है।
खिचड़ी की सादगी हमें संतोष, समानता और सेवा का भाव सिखाती है।

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