राखबुध के बाद से ही ईसाई धर्मावलंबियों का चालीसाकाल प्रारंभ होता है।
खूंटी : राखबुध में माथे पर राख का सांकेतिक विलेपन कर क्रूस चिन्ह बनाया जाता है। क्रूस चिन्ह बनाते वक्त पुरोहित पादरी कहते हैं : मनुष्य तू मिट्टी है और मिट्टी में मिल जाएगा। चर्च के मुताबिक चालीसाकाल प्रार्थना, उपवास और परहेज का काल होता है। चालीसाकाल 40 दिनों का होता है जिसमें ईसाईयों को दान पुण्य करना होता है। मांस मछली, मदिरापान वर्जित होता है अर्थात यह त्याग और तपस्या का काल माना जाता है। आत्मिक शुद्धिकरण पर ज्यादा जोर दिया जाता है। झूठ, फरेब, निंदा शिकायत, हिंसक प्रवृति के कार्य समेत नकारात्मक गतिविधियों से दूरी रखने की नसीहत दी जाती है। अधिक से अधिक लोगों के लिए प्रार्थना और अपने मन, वचन और कर्म से निर्मल रहने पर जोर दिया जाता है। ईसा मसीह के कलवारी पहाड़ की शोकमयी यात्रा का स्मरण करते हुए प्रत्येक शुक्रवार दुःखभोग के 14 स्थानों को याद करते हुए विशेष प्रार्थनाएं चढ़ाई जाती है।
चालीसाकाल में गरीबों को दान देना पुण्य होता है। चालीसाकाल में कई नौकरी पेशा करने वाले गरीबों को आर्थिक मदद करते हैं। गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए पैसे की मदद करते हैं। अनाथालय और वृद्धाश्रम में स्वेच्छा दान करते हैं, जो संपन्न हैं वे वस्त्र समेत अन्य दैनिक उपयोगी सामग्रियों का भी दान करते हैं। चालीसाकाल में ईसाई धर्मावलंबियों में पर्व त्योहार से संबंधित गीत संगीत की मनाही होती है। शादी व्याह, गृह प्रवेश, मंगनी, मेहमानी इत्यादि पर प्रतिबंध लगा होता है। अर्थात चालीसाकाल दीन दुखियों को दान देने का, दुश्मनों को क्षमा करने का स्वयं के अंदर झांकने का पुण्य काल होता है। चालीसा काल के बाद खजूर रविवार आता है फिर पुण्य सप्ताह और गुड फ्राइडे। गुड फ्राइडे के बाद ईस्टर का त्योहार ईसा मसीह के पुनर्जीवित होने की स्मृति में मनाया जाता है अर्थात चालीसा काल मन और आत्मा की शुद्धिकरण का पावन काल होता है।
रिपोर्टर : शहीद अंसारी

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