सरहुल महोत्सव इस वर्ष बड़े ही हर्षोल्लास, श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया।

खूंटी - इस अवसर पर बिरसा कॉलेज हॉस्टल प्रांगण में भव्य और आकर्षक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें जिले के विभिन्न गांवों से आए सैकड़ों ग्रामीण, युवा, महिलाएं और बुद्धिजीवी शामिल हुए। पूरा परिसर मांदर,ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक गीत-संगीत से गूंज उठा, जिससे वातावरण पूरी तरह सरहुलमय हो गया। कार्यक्रम की शुरुआत मुंडारी प्रोफेसर काली मुंडू एवं बासुदेव हस्सा द्वारा विधिवत पूजा-अर्चना के साथ की गई। उन्होंने प्रकृति, धरती माता और साखू वृक्ष की आराधना करते हुए क्षेत्र में सुख-समृद्धि, अच्छी वर्षा और जन-जीवन की खुशहाली की कामना की। पूजा के दौरान पारंपरिक अनुष्ठानों का पालन किया गया,जो आदिवासी संस्कृति की गहराई और प्रकृति के प्रति अटूट आस्था को दर्शाता है।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में खूंटी विधायक रामसूर्या मुंडा उपस्थित हुए। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि सरहुल आदिवासी समाज की आत्मा है और यह पर्व हमें प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की सीख देता है। उन्होंने “जल, जंगल और जमीन” की रक्षा को समाज की प्राथमिक जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि यही हमारी पहचान और अस्तित्व का आधार है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे पारंपरिक त्योहार नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और विरासत से जोड़ने का कार्य करते हैं।

कार्यक्रम में पारंपरिक वेशभूषा में सजे युवक-युवतियों द्वारा सामूहिक नृत्य और लोकगीतों की प्रस्तुति दी गई, जिसने सभी उपस्थित लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और युवाओं का उत्साह इस बात का प्रमाण था कि आज भी सरहुल जैसे पर्व समाज के दिल में जीवंत हैं। पूरे खूंटी जिले में इस पर्व को लेकर उत्सव का माहौल देखा गया। गांव-गांव में लोग पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सरहुल मना रहे हैं, एक-दूसरे को शुभकामनाएं दे रहे हैं और प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता, भाईचारा और सामूहिक जीवन का भी संदेश देता है।

रिपोर्टर - शहीद अंसारी 

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