बारिश में तीन-चार माह टापू बन जाता है डंडोल गांव, कैद हो जाती है ज़िंदगी
खूंटी : विकसित भारत का सपना पीएम का भी है और हर आम नागरिक का भी। लेकिन खूंटी जिला मुख्यालय से सिर्फ 17 किलोमीटर दूर डंडोल गांव आजादी के 79 साल बाद भी बारिश में टापू बन जाता है। तीन-चार महीने यहां की जिंदगी कैद हो जाती है। स्कूल बंद, अस्पताल दूर, और मजदूरी ठप। खूंटी प्रखंड का डंडोल गांव। करीब चार सौ की आबादी। 70 फीसदी लोग दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर। लेकिन बारिश आते ही नदी में तेज बहाव के कारण गांव का संपर्क कट जाता है। रास्ता नहीं, पुलिया नहीं। नतीजा - तीन-चार महीने तक गांव टापू बना रहता है।
बच्चों का स्कूल-कॉलेज जाना बंद हो जाता है। बीमार को अस्पताल ले जाना नामुमकिन हो जाता है। लोग भगवान भरोसे घर में कैद रहने को मजबूर हैं।
"पिछली बार बारिश में मेरा भाई बीमार पड़ा। अस्पताल नहीं ले जा पाए। इलाज के बिना ही उसकी मौत हो गई। गर्भवती महिलाओं को ले जाना सबसे बड़ी मुसीबत है। बच्चे तीन-चार महीने पढ़ नहीं पाते।"
ग्राम प्रधान निकूलस उरांव,और ग्रामीणों ने बताया कि दिहाड़ी मजदूर रोज कमाने-खाने वाले हैं। बारिश में काम पर नहीं जा पाते तो घर में भूखे रहने की नौबत आ जाती है। बीमारों का इलाज गांव में ही भगवान भरोसे चलता है।
"हर साल बारिश में यहां की दिनचर्या थम जाती है। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सब घर में कैद रहते हैं। हर साल सांसद-विधायक को ज्ञापन देते हैं सड़क और पुलिया के लिए। लेकिन चुनाव के वक्त ही नेता आते हैं। वोट लेकर चले जाते हैं, फिर कोई सुध नहीं लेता। ज्ञापन फाइलों में दब जाता है।"
मेरे पीछे जो नदी आप देख रहे हैं, यही डंडोल गांव की सबसे बड़ी परेशानी है। गर्मी में तो लोग जैसे-तैसे पार कर जाते हैं, लेकिन बारिश में ये नदी विकराल रूप ले लेती है। कोई पुलिया नहीं, कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं। इसी वजह से पूरा गांव तीन-चार महीने तक जिला मुख्यालय से कटा रहता है।
सदर कलीम अंसारी, का कहना हैं की इस साल ग्रामीणों ने जिला प्रशासन को फिर ज्ञापन सौंपा है। मांग वही पुरानी - सड़क और पुलिया निर्माण की। अब देखना है कि प्रशासन कब जागता है।
भारत गांवों का देश है। जब तक डंडोल जैसे गांव विकास की पटरी पर नहीं आएंगे, तब तक विकसित भारत का सपना सिर्फ कागजों में ही सिमटा रहेगा। आजादी के 79 साल बाद भी अगर 17 किलोमीटर दूर गांव टापू बन जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है।
रिपोर्टर : शहीद अंसारी
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